रामदरश मिश्र : सहजता जहाँ एक काव्य निकष है
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आठ दशक से भी लंबी काव्य- यात्रा करने वाले संभवतः अकेले कवि हैं रामदरश मिश्र। यह हिंदी के वैश्विक समाज के लिए आह्लाद का विषय है। दीर्घ जीवन तो कई कवियों को मिला लेकिन याद नहीं आता कि उनमें से कोई सृजनात्मक रूप से उस तरह सक्रिय रहा हो जैसे कि रामदरश जी हैं। विगत वर्षों में उनकी नई कविताओं के कई संग्रह प्रकाशित हुए हैं। हिंदी के साहित्य जगत ने उनके इन संग्रहों को पर्याप्त मान सम्मान भी दिया है। मिश्र जी की कविताओं पर विचार करते हुए यह बहुत स्पष्ट दिखाई देता है कि वे सदैव ऊर्ध्वमुखी रहे। उनकी दृष्टि भविष्योन्मुखी और यथार्थवादी रही। जिस सत्य को कहने से बहुतेरे कवि परहेज करते रहे, मिश्र जी ने उसे पूरी ईमानदारी से कहा। आज भी कह रहे हैं जबकि वे उम्र के सौवें वर्ष में हैं। यह कैसा विलक्षण संयोग है कि वे आज भी उसी विश्वास पर अडिग हैं जिसे अपने काव्य जीवन के बिल्कुल आरंभिक दिनों में उन्होंने अपने भीतर विकसित किया था। उनके शुरुआती दिनों के एक गीत का टेक है-
चल रहा हूँ क्योंकि गति से पंथ का निर्माण होगा।
कहना होगा कि बिना किसी शोर के यह कविता में वैज्ञानिक चेतना का निवेश था। इस गीत में कवि विडंबनाओं के बीच उम्मीद का एक सूत थामे हुए है। वह लिखता है-
आंधियों में भी दिवा का दीप जलना ज़िंदगी है
पत्थरों को तोड़ निर्झर का निकलना ज़िंदगी है।
एक कवि के रूप में रामदरश मिश्र का वास्तविक विकास आजादी के बाद मोह भंग वाले दौर में हुआ था लेकिन उनकी कविता में वैसी अनास्था अभिव्यक्त नहीं हुई है जैसी उस दौर के कई दूसरे कवियों के वहां। अपनी पूरी बनावट में वे उम्मीद और जिजीविषा के कवि हैं। 'बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ' उनकी एक प्रसिद्ध कविता है। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद सपनों के टूटने की जो एक पूरी शृंखला थी उसमें आम जन के दुखों का रंग एक-सा हो गया था। सपने भी धूसर हो गए थे या हो रहे थे। लोकतंत्र में ऐसा होना विषाद का ही विषय बन सकता था और ऐसा हुआ भी। रामदरश जी अपनी इस कविता में लिखते हैं-
मित्रो!
हमारी तुम्हारी ये बैरंग लावारिस चिट्ठियाँ
किसी दिन लावारिस जगहों पर
परकटे पंक्षी की तरह
पड़ी पड़ी फड़फड़ाएंगी
और कभी किसी दिन
कोई अजनबी
इन्हें कौतूहलवश उठाकर पढ़ेगा
तो तड़प उठेगा
ओह!
बहुत पहले किसी ने
ये चिट्ठियाँ
शायद मेरे नाम लिखी थीं।
कहने की आवश्यकता नहीं कि 'यह अजनबी ' उस दौर का कोई भी व्यक्ति हो सकता था। एक संश्लिष्ट यथार्थ को ऐसी सहजता के साथ कविता की प्राणवस्तु बनाना उसी कवि के बूते की बात हो सकती है जो जन्मना कवि हो।
प्रेम रामदरश मिश्र की कविताओं और गीतों का एक अनिवार्य घटक है। लेकिन यह याद रखना अत्यंत आवश्यक है कि उनके वहां प्रेम की अभिव्यक्ति दांपत्य प्रेम के रूप में अधिक हुई है। उनकी 'तुम बिन' शीर्षक कविता बहुत से काव्य-प्रेमियों की स्मृति में होगी। इस कविता का प्रत्येक बंद उज्ज्वल दांपत्य की आभा से दीप्त है। कविता शुरू होती है-
तुम बिन कुछ खोया-खोया सा
कुछ सूना-सूना सा लगता है
रीते घर का हर रीतापन
कुछ दूना-दूना लगता है।
फिर प्रत्येक बंद अलग-अलग ढंग से जीवन के रीतेपन और अकेलेपन को सामने रखता है। लिखे जाने के दशकों बाद भी यह कविता बहुत से नए और युवा पाठकों को अपनी लगती होगी। इसी रूप में प्रेम एक सार्वभौमिक सत्य है। यह अकारण नहीं कि कवि मन में असंख्य मन समाए होते हैं। कई बार कवि की नितांत अपनी व्यक्तिगत बात भी 'अन्य' की बात होती है। 11 अप्रैल 1947 को लिखा रामदरश जी का एक गीत है 'स्वर्गीया के प्रति'। यह गीत संभवतः उन्होंने अपनी पहली पत्नी के असमय निधन पर लिखा था। 'आज मैं पथ पर अकेला आज मेरे गान सूने' की टेक पर खड़ा यह गीत दांपत्य और साहचर्य का एक मार्मिक गीत है। उनकी प्रेम पर केंद्रित यह कविता भी रोकती और बतियाती है-
कुछ फूल कुछ काँटे
हमने आपस में बांटे
यात्रा के हर मोड़ पर हमने
एक दूसरे का इंतजार किया है
हाँ, हमने प्यार किया है।
अपनी रचनाओं को लेकर एक आत्मविश्वास रामदरश जी के भीतर बिल्कुल आरंभिक दिनों से ही है। इस विश्वास का कारण उनके 'गीत हमारे' शीर्षक गीत में अभिव्यक्त हुआ है। वे कहते हैं- नभ में नहीं, धरा-ज्वाला में, पलते हैं गीत हमारे। अर्थात हर प्रकार की वायवीयता को टाटा, बाय-बाय। उनके गीतों में प्रकृति अपने प्राकृत रूप में दिखती है। संध्या गीत, मन डूबा सन्नाटे में, मेरी राह न बांधों!, डूब गया दिन धीरे-धीरे, जेठ की भोर, मधुपर्व, चाँद को आज रात भर देखा, रात रात भर मोरा पिहंके, फिर फागुन आ गया इसी तरह के गीत हैं। मनुष्य और प्रकृति के नाभिनाल संबंध को जीवंत करते। इन गीतों और कुछ अन्य कविताओं को पढ़ते हुए रामदरश जी की सूक्ष्मतम पर्यवेक्षण सामर्थ्य का पता चलता है। कोई कवि यूँ ही आठ दशकों तक नवोन्मेषी बना नहीं रह सकता। यह भी स्वाभाविक है कि जो कवि प्रकृति के अछोर सौंदर्य का गायक रहा है, वह बदलते समय में मनुष्य की विविध वासनाओं को लक्षित करते हुए 'साक्षात्कार' जैसी कविता भी लिखे। वे लिखते हैं- चंदन वनों को बंद कर लिया गया है/ संगमरमरी मकानों में। इस और ढेर सारी अन्य कविताओं में विडंबनाओं की अचूक पहचान की है इस कवि ने। इस कविता में रामदरश जी लिखते हैं-
ओह, कैसी हवा चल रही है आजकल
कि अमराई के सारे बौर
देखते-देखते झुलस जाते हैं
बच्चे पैदा होते ही
विकलांग हो जाते हैं
अन्न
खाने के पहले ही अपच करने लगता है
नदियां
अपना जल लिए दिए
खुद ही प्यास जाती हैं
बादल आकर
बिना बरसे, जल लिए लौट जाते हैं
धरती के रस को पीती हुई
बालियाँ फसलों के कंधों पर
लाशों की तरह लटक जाती हैं।
यह पूरी कविता एक शोकगीत की तरह है। कह सकते हैं कि एक आईने की तरह भी है जिसमें हम अपने समय को उसके वास्तविक रूप में देख सकते हैं और भविष्य को बचाने का कोई यत्न कर सकते हैं। कविता और कलाएं यही काम करती हैं। वे धीरे से हमारी चेतना बदल देती हैं।
रामदरश मिश्र अपने राजनीतिक होने का शोर नहीं करते। उनकी कविताएं भी किसी प्रकार का शोर नहीं करतीं। एक कवि के रूप में वे अपने आरंभिक दिनों से आश्वस्त हैं कि इस तरह का कोई भी शोर अंततः एक साहित्यिक प्रदूषण है। याद रखना चाहिए कि राजनीतिक चेतना कवि होने की अघोषित किंतु अनिवार्य शर्त है। जिस कवि को अलग से अपनी राजनीति स्पष्ट करनी पड़े, उस पर विचार करना चाहिए। रामदरश जी की एक कविता है- रात। इस कविता को पढ़िए और देखिए कि राजनीतिक कविता इस तरह भी लिखी जा सकती है-
रात जितनी घनी होती है
उतनी ही तेज़ होती है
मन में रोशनी की चाह
और रोशनी चाहे जहाँ भी रहे
रुकती नहीं
चली आती है खुली आंखों के पास
रात रोशनी की चाह है
आओ, इसे कोसें नहीं
केवल अपनी आँखें खुली रखें।
इसी तरह की एक अर्थवान कविता है- हाथ। धक से लग जाने वाली कविता। संश्लिष्ट यथार्थ को सहजता से कह देने वाली कविता। यहीं यह कहना भी जरूरी है कि रामदरश मिश्र ने उपेक्षा सहते हुए भी चले हुए मुहावरों की कविता नहीं लिखी। उन्होंने सहजता को अपना काव्य निकष बनाया। उन्होंने नीम और गेंदे के फूल पर कविताएं लिखी हैं। गेंदे का फूल किसान मन के करीब होता है। वह अभिजन के समानांतर आम जन की अभिरुचि के अधिक करीब पड़ता है। और कहना चाहिए कि यही कवि के रूप में रामदरश जी की शांत और संतुलित प्रतिबद्धता है। उनकी एक कविता माँ पर केंद्रित है। इस कविता में सौ बरस के इस कवि के बचपन की स्मृतियां हैं। उस स्मृति में चूकवश हंसुए से लगी चोट की स्मृति है। माँ की व्याकुलता है और स्कूल जाने से पैदा हुई वह उजास है जिसने इस कवि का जीवन बदल दिया था। यह कविता न सिर्फ माँ पर लिखी बहुतेरे कवियों की ढेर सारी भावुक करने वाली कविताओं से भिन्न और मन की त्वचा को स्पर्श करने वाली है बल्कि कवि की उस काव्य भूमि का पता भी है जिसे उसने कभी गिरवी नहीं रखा। बेच देना या भूल जाना तो बहुत दूर की बात है। कवि की भावभूमि का पता देने वाली एक और कविता है- उत्तर। इस छोटी सी कविता को देखिए और मनन कीजिए-
उस दिन साथियों की भीड़ में
किसी बच्चे ने आकर एक पत्र थमा दिया था
वह प्रेम-पत्र था पता नहीं किसका
तब से मैं प्रेम-पत्र का उत्तर दिए जा रहा हूँ
कभी गद्य में कभी पद्य में
कभी इसको, कभी उसको
जाने किस-किसको
ओह, कितने वर्ष हो गए उत्तर लिखते हुए...
यहाँ यह रेखांकित करना आवश्यक है कि यह कोई सामान्य प्रेम-पत्र नहीं है। यह मनुष्यता का मनुष्यता को लिखा जाने वाला प्रेम-पत्र है। एक सच्चा कवि उम्र भर यही करता है। यह पत्र कभी तुरंत पढ़ लिया जाता है तो कभी महाकवि भवभूति की तरह यह विश्वास जताते हुए प्रतीक्षा करता है कि कभी तो कोई समानधर्मा आएगा जो इस पत्र के वास्तविक तत्व को समझेगा और समझाएगा भी। रामदरश जी कविता की प्रकृति को न केवल समझते हैं बल्कि समझाते भी हैं-
जब मैं बोलता रहता हूँ
तब कविता चुप रहती है
जब मैं चुप हो जाता हूँ
तब कविता बोलने लगती है।
यह याद रखना चाहिए कि जहाँ सब मौन हो जाते हैं, वहाँ कविता न केवल बोलती है बल्कि समय का भेद भी खोलती है। यह विश्वास रामदरश मिश्र ने अपनी कई कविताओं में दुहराया है। उनकी ग़ज़लों में भी समय की आवाज़ दर्ज़ हुई है। उनके कुछ अशआर बहुत लोकप्रिय हुए हैं। उनका यह शेर तो बहुतों का सहचर रहा है-
जहाँ आप पहुँचे छलांगें लगा कर
वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे- धीरे।
इसी तरह कोई कवि 'अन्य’ की आवाज बनता है। रामदरश मिश्र ने एक जरूरी और यशस्वी काव्य-यात्रा संभव की है। इस मुक्तक में जैसे उनका अपना ही जीवन अभिव्यक्त हुआ है-
जानता है तन कि उस पर बुढ़ापा आया हुआ
किंतु मन पर हँसी सा जीवन अभी छाया हुआ
अभी भी उसको बुलाती अपनी मिट्टी की सदा
अभी भी लगता समय है गीत ज्यों गाया हुआ।
(यह आलेख कवि के जीवित रहते लिखा गया था)
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जितेन्द्र श्रीवास्तव प्रतिष्ठित कवि-आलोचक हैं। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : जितेन्द्र श्रीवास्तव
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