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जितेन्द्र विसारिया की कविताएँ

Sep 16
4 min read


हम


यह कोरा काग़ज़

तुम्हारे नाम की

मुहर लगते ही

धन्य हो जाएगा


जीवन का महाकाव्य

किसी नायक के पूर्णत्व की

गरिमा से रहित 

अधूरा है


जैसे एक शून्य हूँ मैं

जैसे तुम—‘एक’ 

हमारा सान्निध्य 

तुम्हें पाकर

दस गुना 

हो जाएगा


मैं-मैं हम पता नहीं

कब से कर रहे हैं

हम होकर उस

सँकरी गली में

चलकर देखें

जहाँ दो नहीं

समाते


आइसलैण्ड में 

बर्फ़ घुलती है

तो पानी हो जाती है

पानी जमता है 

तो बर्फ़


हममें शायद

इतना ही अन्तर है

देखने वालों की नज़र में

हम बनते-बिगड़ते रहते हैं

वस्तुतः हम एक हैं

और एक होकर

रहते हैं


 

तुम

     

हृदय की कंदराओं में 

प्रकाश बनकर अवतरित हुए थे

प्यासी धरती के ओंठों पर 

मेघमाला सा आगमन हुआ था तुम्हारा


मैं निरपराध नहीं हूँ

समुद्र में डूबते हुए को

जल-सा उतरते देखना

डुबोना या तारना 

उसके बस में नहीं 

तटस्थ न होते हुए भी 

तटस्थ रहना उसकी नियति है


तुम्हें डूबना नहीं है...

समुद्र में इतनी ताक़त कहाँ 

कि रोक ले तुम्हारी साँसें 

खोल दे मृत्यु के द्वार 


तुम अगस्त हो 

समुद्र तुम्हारा आचमन होगा 

डूबना तट की नियति है

तुम तो नूह की नाव

और मनु की नौका हो


हमे विश्वास है कि तुम नहीं हो

घनानंद की विसासी सुजान 

तुम तो सोहनी-सा कच्चा घड़ा लिए 

बढ़ती रहोगी प्रेम-पथ पर 

यूँ ही, इसी तरह


  

गले लगना


वह मिला

और उसने बढ़कर

मेरा माथा चूम लिया


यह कहते  कि 

मैं हर किसी को

इस तरह नहीं चूमता


मैंने कहीं सुन रखा था 

कि चूमना किसी का माथा 

होता है उसकी आत्मा को चूमना


मैं ठिठका रहा कुछ क्षण

बोल नहीं सका कुछ भी

और बोलकर करता भी क्या?

बदले में उसका माथा चूमना

बदला ही होता

उसकी आत्मा को छूने का


तब कुछ देर बाद 

वही बोला—ठीक है 

यदि तुम नहीं छू सकते

किसी की आत्मा को

चूम नहीं सकते

किसी का स्नेहासिक्त माथा


तो चलो आओ

कम से कम

गले ही लग जाओ

गले लगना भी

कम नहीं होता

किसी के

मन को छूने से!

   


तेरा होना


तेरा होना ही कितना

सुकून देता है

इस हारे मन को

कवि ने कहा था

ढाई आखर बहुत हैं

तेरे-मेरे बीच

पर अब वो भी मुझे

पहाड़ लगते हैं


बर्फ़ और पानी में भेद 

कितना निरर्थक लगता है

बिना जाने तंग आ गया हूँ 

इस रोज़ की तू-तू, मैं-मैं से

हम होने की कोई राह है

तो मेरा पानी होना


मैं नहीं कहूँगा 

तू मेरे लिए बर्फ़ बन 

या वाष्प

तेरा होना ही बहुत है

एक सुखद अनुभूति है 

तुझे जानना


अगर तू भाप बनता है

और में किसी के आँसू

तब भी ठंडी आह बनकर

तू वहीं कहीं होगा...

मैं अगर किसी जड़ पर गिरकर

बनता हूँ शुष्क पत्तों की हरियाली

तो तू शबनम बनकर ज़रूर बिखरेगा


मुझे यक़ीन है

तू मुझसे जुदा नहीं

मैं भी तुझसे फ़ना कहाँ?


  

तुमसे प्यार


मैं तुमसे प्यार करता हूँ

उस ज़िद्दी बच्चे-सा

जो माँ से मार खाने के बाद भी

लौटता है हर बार

अपनी माँ की ही ओर

इस उम्मीद में 

कि एक वही तो है

उसका एकमात्र परम धन

कि उसके अतिरिक्त वह

किसी अन्य को नहीं पाता

अपना मसीहा और चारागर


कि क्या हुआ उसने उसे मारा

दुत्कारा और धकेल दिया

कुछ पल को अपने से परे—दूर

कि ऐसा पहली बार तो नहीं हुआ

कि उसने सहा हो उसका

मार-दुलार और प्यार

एक साथ एक ही पल में 


मैं उसी अबोध शिशु-सा

अपनी नन्हीं बाँहें उठाए

डगमगाते क़दम हर बार

बढ़ता हूँ तुम्हारी ओर

इस उम्मीद में 

कि उस बार ना सही

इस बार तो अवश्य

थाम ही लोगे मजबूती से 

भर ही लोगे अँकवार में मुझे

कि ममता का दूसरा नाम ही तो 

प्रेम और उपकार है।


  

प्राप्ति 


खोना-पाना

यदि प्रेम है

तो बेचना-ख़रीदना भी 

एक सुख

तुम्हारी प्राप्ति 

एक मात्र लालसा 

और भोगना 

हमारा अन्तिम लक्ष्य

तब मैं कैसे कह दूँ

शलभ को लोभी और

भ्रमर को भृष्ट


समय

बदलता है

परिवर्तित रहती हैं

रूप की छटाएँ

और रस का उन्माद


कल जब तुम न होंगे

न होगा हमारे सामने

तुम्हारी देह का दपर्ण और

उत्तेजना  का ज्वार—


तब भी डूबना होगा 

हमें तुम में और

छलकाने होंगे

नेह घट

सब पर


क्योंकि तुम्ही से  

प्रेम करते हुए

सीखा है मैंने

सबसे प्रेम करना।



उम्मीद का ठिकाना


उसने कहा

“सच कहें तो उम्मीद करना

बड़ा बुरा होता है

जब वे पूरी नहीं होतीं

तब बड़ा क्षोम होता है।”


सुनकर मैं ख़ामोश रहा

नत-सिर सोचता रहा देर तक

फिर मैंने अपनी

झुकी गर्दन उठाई

और उसके चेहरे पर टिका दी

फिर अपने रुँधे कंठ 

और भरी ऑंख

उससे कहा—


“मैं इस बेरहम दुनिया में

किसी को नहीं जानता

कोई नहीं मेरा 

तुम्हारे सिवाय

बस तुम्हीं एक से

उम्मीद रखता हूँ

तुम मेरी पहली और

आख़िरी उम्मीद हो…

क्या तुम  उसे

पूरा नहीं करोगे?


मैंने अपने धाड़-धाड़ बजते हृदय 

और बीच-बीच उठती

हिचकी रोक

उससे फिर कहा—

“बहुत नहीं, थोड़ी-सी

जैसे भर अकाल 

छोड़ देते हैं परिजन

अपने प्रियजनों को

अपनी भूख से कुछ निवाला अन्न

जिन्हें वे देखना नहीं चाहते

ठीक एकदम अपने 

से पहले—मरता…!!!”


यह सुन अचानक

जैसे वो चौंक गया

डर गया शायद

अपना कुछ 

छिनता-सा देख

फिर उसने बिना देर किए

अस्फ़ुट किंतु मजबूत शब्दों में कहा—

“दुनिया में कोई भी मनुष्य

सभी की उम्मीदें

पूरी नहीं कर सकता…”


यूँ बोलने की अब

बारी मेरी थी

बोलने को उससे

बोल जाता

बहुत कुछ 

उसके बदले व्यवहार

और हृदय हीनता पर

ज़्यादा न सही

कुछ तो दे ही सकता था

उपदेश और उपालम्भ

दिनों-दिन ख़राब होती

मतलबी दुनिया का


किंतु तब मैंने ख़ामोश रहना

श्रेयस्कर समझा 

और लौट आया 

इस अज़नबी दुनिया में

जहाँ मेरा कोई नहीं था


उस दिन अपने अनमने

और भारी क़दम लौटते

फिर-फिर मुड़-मुड़कर देखते

उसका निस्पृह/भाव विहीन चेहरा

ठीक-ठीक जान पाया था

प्रेम और उम्मीद का

सही ठिकाना—


जहाँ  प्रेम   नहीं

वहाँ उम्मीद नहीं।


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जितेंद्र विसारिया गद्यकार-कवि हैं। 


प्रकाशित कृतियाँ :  आत्मकथाओं का वैश्विक परिदृश्य और हिन्दी दलित आत्मकथाएँ (शोध), हिन्दी लोक महाकाव्य आल्हा और उसके अंतर्जनपदीय स्वरूप (शोध परियोजना), नये सजन घर आये (कहानी संग्रह), ज़ख़्म (उपन्यास), माँ की निगाह में पिता (कविता संग्रह), दौड़ (पटकथा), हिंदू कोडबिल : भारत में स्त्री अधिकारों का मैग्नाकार्टा (डॉक्यूमेंट्री)।


सम्मान :  ज्ञानपीठ का युवा नवलेखन अनुशंसा पुरस्कार (2015), माधुरी देवी अग्रवाल पुनर्नवा पुरस्कार (2019), चम्बल फ़िल्म फेस्टिवल का ‘बेस्ट सिनेमा क्रिटिक्स अवार्ड (2022)।





1 Comment


Guest
Sep 16

अच्छी कविताएँ हैं।

-शिवम

Edited
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