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निहाल सिंह की कविताएँ

  • 10 minutes ago
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सरसों कट रही है 


सरसों कट रही है 

बसंत के मौसम में 

भंवरे बिलख रहे है खेत की क्यारियों में 

चीटियाँ गुड़ा रही है 

गोबर की महीन टुकड़ियों को 

खेत की मेड़ के ऊपर 

खूड़ के ऊपरी भाग पर 

अण्डे दे रही है तीतरी

वह संकेत दे रही है 

इस चौमासे में मेघों के

उठने की ख़बरों का

बूँदों के धरा पर 

जमकर बरसने का

तेज़ हवाओं के चलने का

कुछ कुत्ते पीछे पड़े हैं

ख़रगोश के

उसको पकड़ने के चक्कर में 

थककर बैठ जाते है 

झाड़ियों के सिरहाने पर 

बजरी से भरी हुई चार-पाँच 

ऊँट गाड़ियाँ जा रही हैं

तपती सड़क पर।



बसंत


पपीहे का शोर 

गूंज रहा है 

उपवन के कोने-कोने में 

तितलियां हौले से चूस रही हैं

फूलों के रस को

छत पर बच्चे

देख रहे हैं गुनगुनी धूप में 

उड़ते परिंदों के झुंड को

जिनमें सबसे छोटा बच्चा 

कोशिश कर रहा है 

उड़ते परिंदों को गिनने की 

नन्ही उँगलियों पर

उनकी तेज़ रफ़्तार के आगे 

वह गिनती भूल जाता है 

और परिन्दे दूर

आगे निकल जाते है 

जहाँ से उन्हें गिनना 

असंभव सा लगता है।



नन्ही चिड़िया 


नन्ही चिड़िया बैठी है दुबक कर 

स्वयं के घोंसले में 

देख रही है मतलबी दुनिया को 

अपना उल्लू सीधा करने वाले लोगों को

एक हड्डी के टुकड़े के लिए 

लड़ते चार कुत्तों को

रोटी पर बैठे काले कौवे को

गंदे पानी में टर्रु-टर्रु करते 

चार-पाँच मेंढ़कों को

काली माटी में रेंगते 

अनगिनत काले कीड़ों को

फटफटी पर सवार 

जोशीले युवा लड़को को।



चिड़िया की चू-चू 


चिड़िया की चू-चू 

कान से टकराते ही 

ऑंखें खुल जाती हैं 

श्रीमती जी के हाथों से बनी चाय 

जिसमें डाली 

अदरक, लौंग और इलायची की महक

हौले से बैठ जाती है 

बिस्तर पर पड़ी सिलवटों पर

अख़बार में छपी 

फिर वही घिसी-पिटी ख़बरें 

महंगाई बढ़ रही है 

पेट्रोल के दाम 

आसमान छू रहे है 

गैस सिलेंडरों की 

कीमतें बढ़ गई है

पहाड़ी इलाकों में 

बस खाई में गिर गई है 

फिर वही ख़बरें डाल 

देते है अख़बार के 

पहले पृष्ठ पर 

नई ख़बरें तलाश 

कौन करे, क्यूँ करे

जबकि बिक रही हैं 

पुरानी ख़बरें 

धड़ाके से।



रेल की सीटी 


रेल की सीटी बजते ही 

वह दौड़कर चली आती है 

समीप मेरे 

और मैं खो जाता हूँ

उसकी उदास ऑंखों के भीतर 

मुझे कुछ ख़बर नही मेरी

थम सा गया पल 

जैसे कोई परिन्दा चिपक गया हो

बिजली के तार से 

और वह हिल-डुल नहीं रहा 

शरीर उसका काम 

करना छोड़ दिया हो

मैं भूल गया कि

सवेरे वाली गाड़ी से 

मुझे शहर जाना था 

याद है तो बस 

उसका खिलता चेहरा

खुली बाहें, 

झुकी पलकें,

उसके दो होठ 

जो एक-दूसरे से

चिपके हुए हैं

और फिर आहिस्ता से 

छूट जाती है गाड़ी 

स्टेशन मास्टर हरी झंडी 

हिलाता रह जाता है 

हवा में।



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निहाल सिंह एक किसान कवि हैं। कुछ वेबसाइट्स पर उनकी कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। ईमेल‌ : nihal6376r@gmail.com 

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