शिम्बोर्स्का की कविता में मृत्यु का पैरहन
- May 15
- 6 min read

पहले विस्लावा शिम्बोर्स्का की कविता ‘सीन फ्रॉम अबव’ पढ़िए -
एक मृत कीड़ा खेत के रास्ते में पड़ा है
तीन जोड़े पैर करीने से पेट पर मोड़े।
मृत्यु की बदहवासी के बजाय
यहाँ सब कुछ चुस्त दुरुस्त है
दृश्य में ख़ौफ़ कुछ ख़ास नहीं
दायरा केवल आसपास ही,
गेहूँ के जवारों से पुदीने की झाड़ी तक।
शोक सीमित
आसमान नीला है।
हमारी दिमाग़ी शांति के लिए
जीव-जंतु मरते हैं छिछली मौत
उनका देहांत नहीं होता, वे बस मर जाते हैं।
अपने पीछे छोड़ जाते हैं
कितनी कम दुनिया और कितने थोड़े जज़्बात !
शायद कम कष्ट में ही
हो जाते हैं विदा।
उनकी भीरु आत्माएं कभी नहीं डराती अंधेरों में।
वे अपनी औक़ात जानते हैं,
हमें पूरी इज़्ज़त देते हैं।
इसलिए रास्ते में पड़े
धूप में चमकते मुर्दा कीड़े के लिए
कोई शोक नहीं
नज़र भर में ही
ध्यान देने जितना हो जाएगा
ज़ाहिर है इसे कुछ ख़ास नहीं हुआ है।
ज़रूरी मसले केवल हमारे लिए आरक्षित हैं
हमारे जीवन और मरण के लिए
हमारी मृत्यु को ही है रास्ते का पहला अधिकार
यातायात के नियमों की तरह।
(अनुवाद: संजय व्यास)
शिम्बोर्स्का की यह कविता एक भृंग की अनाम मौत की करुण अभिव्यक्ति है। करुण इस अर्थ में कि पूरा जीवन हेयताओं में बिताने के बाद उसे एक हेय मृत्यु ही नसीब होती है।
कविता हम मनुष्यों की विराट सृष्टि में अनेक ‘तुच्छों’ को नज़रअंदाज़ कर देने के अहंकार को रेखांकित करती है।
एक कीड़े की मौत किसी की दैनंदिनी को अस्त-व्यस्त नहीं करती, जीवन का कोई क्रम भंग नहीं करती। उसकी मौत किसी प्रकार का भय या ख़ौफ़ पैदा नहीं करती। अगर उसकी मृत देह रास्ते में पड़ी है तो उससे वातावरण की कुल स्वच्छता पर कोई ख़ास असर नहीं होता। केवल झाड़ू का एक फटका काफ़ी है और कीड़े के किनारे हो जाने से हमारी व्यवस्था पुनः चुस्त-दुरुस्त हो जाएगी।
वैसे भी कीड़ा हमारे लिए इतना चिंतित है कि अपनी मृत देह से रत्ती भर भी जुगुप्सा उत्पन्न न होने पाए, इसका पूरा ध्यान रखता है। अपने मरने के क्षण में भी उसने अपनी टाँगे इतने करीने से मोड़ रखी है कि कहीं उसकी देह से अतिरिक्त का कोई दावा न प्रस्तुत हो जाए। हमारे किसी पशोपेश में पड़ने के तमाम विकल्प वह बंद कर देना चाहता है। हमारी सुखद दृश्यावली में वह कुछ भी अवांछित उत्पन्न नहीं करना चाहता। वह हमारे लिए किसी तरह की असुविधा बनने से अपने को रोकता है। वह हमें असहज कतई नहीं करना चाहता। अपने तुच्छ जीवन की इति के बाद अपनी मृत्यु में भी वह तुच्छ बने रहना चाहता है। वह हर हाल में एक ख़ामोश मौत चाहता है और अंततः अपनी इच्छा के मुताबिक बिना शोर-शराबे के मर जाता है।
कोई भी लाश अपने आप में एक ख़ौफ़नाक दृश्य होती है। पर कीड़े की मृत देह तो इतनी कम है कि अपनी लम्बाई-चौड़ाई में उसे लाश भी नहीं कहा जा सकता। वह किसी भी तरह की परिभाषा होने की न्यूनतम अर्हताओं को पूरा नहीं करती।
मृत्यु अपने साथ भय लेकर आती है। मृत्यु और भय सहजात हैं। कब से ऐसा होने लगा कि मृत्यु और भय दोनों साथ-साथ ही दिखने लगे, नहीं पता। हो सकता है मौत के साथ सब कुछ समाप्त हो जाने का डर इसके पीछे हो। या हमेशा के लिए अधूरा छूट जाने की आशंका। या फिर मौत के समय शरीर की अपने आप को हर क़ीमत पर ज़िंदा रखने की जद्दोजहद, उसकी मौत से पीड़ा भरी खींचतान इसकी वजह में हो, कुछ भी निश्चित कहा नहीं जा सकता पर यह निश्चित है कि मृत्यु का भय एक आदिम भय है। ऐसा अब तक ज्ञात हर स्मृति से ही है। और मृत्यु का डर जितना मरने वाले में है, उतना ही ख़ौफ़ किसी मृत्यु का उसे क़रीब से देखने वाले में भी होता है।
कीड़े की मौत में इस इस ख़ौफ़ का दायरा लेकिन बेहद सीमित है। कवि के मुताबिक नगण्य-सा या गौण। बस एक-दो फ़र्लांग दूर तक ही।
कीड़ा इतनी अभागी मौत मरता है कि कोई रोने वाला नहीं। कोई शोक नहीं, कोई उदासी नहीं। उसकी विदाई एक बेआवाज़, समारोहहीन विदाई है।
चुपचाप जाने की यह इंतिहा है। ऐसे भी कोई जाता है!
एक कीड़ा अपने मरने को लेकर भी इस अपराधबोध से ग्रस्त है कि वह अपने जाने से उत्पन्न हर आवाज़, हर खटके को लेकर अतिरिक्त सतर्क है। कहीं कुछ सुनाई न दे। इंसानों की दुनिया में खलल वह बिलकुल नहीं चाहता। इसलिए वह एक चुप मौत का रास्ता चुनता है।
अपने उदर पर अपनी बारीक टाँगे धरे वह जैसे हमें कहना चाहता है कि सब कुछ चाक-चौबंद है। उसे लेकर किसी तरह से परेशान होने की ज़रूरत नहीं।
शिम्बोर्स्का की यह कविता एक तरह से एक कीड़े की मौत का शोकगीत है। पर इसका केवल यही अर्थ नहीं होना चाहिए। इनकी कविताओं में विभीषिका और मृत्यु मोटिफ़ की तरह कई बार आते हैं। विभीषिकाएँ अपने साथ असंख्य मौतें ले आती हैं। बेतादाद मौतों की भयावहता मृत्यु की गरिमा भी तार-तार कर देती है।
याद आती है इनकी कविता ‘द एन्ड एंड द बिगिनिंग’ की ये पंक्तियाँ-
‘किसी को तो ठेलना है मलबा, एक किनारे
जिससे कि गुज़र सकें शवों से लदी गाड़ियां’
एक और कविता ‘आतंकवादी देखता है’ में बम फटने का समय बता दिया गया है। उसके बाद सेकंड दर सेकंड बढ़ते तनाव के दाब को झुरझुरी के साथ हम महसूस कर सकते हैं।
उनकी ‘रिटर्न बैगेज’ कविता छोटे बच्चों की क़ब्रों के बारे में है। वह कहती हैं -
‘बच्चों का क़ब्रिस्तान।
हम उम्रदराज़ लोग
चुपके से निकल लेते हैं
जैसे अमीर लोग
गुज़रते हैं झोपड़पट्टियों से।
‘वापसी के थैलों में
उनके पास कुछ ज़्यादा नहीं था
कुछ चिथड़े अपनी देखी दुनिया के
जो बमुश्किल थे एकाधिक
मुट्ठी भर हवा, जिसमें फड़फड़ाती कोई तितली।’
पर अगर हम और ग़ौर के साथ इनकी कविताओं को पढ़ते हैं तो लगता हैं संभवतः शिम्बोर्स्का की कविताओं में दिल दहला देने वाली विभीषिकाओं के बनिस्बत मृत्यु ही केंद्र में अधिक है। और यह मृत्यु अलग-अलग मुखौटों के साथ, अपनी तमाम विडम्बनाओं के भेस में दिखाई देती है।
जैसे- ‘बिना किसी अतिशयोक्ति के- मृत्यु पर’ - कविता में मौत को अपने तरीक़े से अपना काम करते दिखाया गया है। वह उतनी सर्वशक्तिमान भी नहीं, जितनी उसे माना जाता है। अपने काम में वह इतनी उलझी है कि बिना किसी कौशल या व्यवस्था के बस उसे अंजाम देने में लगी रहती है। उसकी जीत हमें दिखाई देती है पर उसकी विफलताएं भी अनगिनत हैं। ख़ाली वार और बार बार की कोशिशें उसकी हार को दिखाती हैं। कविता कहती है-
‘कभी कभी तो यह
उड़ती मक्खी नहीं मार पाती
इल्लियां भी कई बार
इसके पार सरक जाती हैं’
शिम्बोर्स्का कविताओं में मृत्यु पर प्रयोग करती हैं। वे इससे सम्बद्ध विडम्बनाओं को दिखाकर इसे विभिन्न कोणों से देखती-परखती हैं। वे मरने वाले के प्रति पर्याप्त करुणा बरतकर भी मृत्यु को वस्तुपरक नज़रिये से देखना चाहती हैं।
‘सीन फ्रॉम अबव’ कविता में भी कीड़े की मौत इस तरह से आती है कि हमें धूप की चमक या आसमान की नीलाई में कोई परिवर्तन नहीं महसूस होता। आसपास लगभग सब कुछ वैसा ही बना रहता है, जैसा पहले था। कीड़ा इस तरह गरिमाहीन मौत मरता है कि इंसानों की गरिमा पर कोई आंच न आए। कि उस पर ध्यान न देने से मनुष्य कम मनुष्य न लगने पाए। कीड़ा चुपचाप परिदृश्य में विलीन हो जाता है और हम अपने कामों में व्यस्त बने रहते हैं।
मृत्यु कितने पैरहन बदल कर आती है, यह इनकी मृत्यु पर अनेक कविताओं में हम समझ सकते हैं। वह भयावह है, शक्तिशाली है, मासूमों का शिकार करती है, धमाकों में आती है, युद्धों में आती हैं, नरसंहारों में आती है और बेवजह आती है। उसका कारखाना सतत है पर उसमें कौशल नहीं, व्यवस्था नहीं, करीना नहीं। उसका तरीका बेढब है। वह ताकतवर है पर उसकी शक्ति अपरिमित नहीं। कई बार उसके वार ख़ाली जाते हैं। वह जब प्रलय रचती है तो उसका डरावना रूप सामने आता है पर जब वह निरीह जंतुओं में आती है तो आसानी से उसकी अनदेखी की जा सकती है। वह मनुष्यों के अहंकार का मर्दन हर बार नहीं कर पाती।
गोल चक्कर वेब पत्रिका अत्यंत सीमित संसाधनों से चल रही है। इस वेबसाइट के संचालन में आर्थिक सहयोग देने हेतु दिए गए क्यू आर कोड का उपयोग करें :

विस्लावा शिम्बोर्स्का (1923-2012) महान पोलिश कवयित्री थीं। उन्हें साल 1996 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया।
संजय व्यास के दो गद्य संग्रह ‘टिम टिम रास्तों के अक्स (2014)’ और ‘मिट्टी की परात (2021)’ प्रकाशित हैं। गोल चक्कर पर इनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : इतिहास के आवरण में होर्हे लुईस बोर्हेस की अपनी सृष्टि
%20(3).png)


Comments