लोई अली ख़लील की कहानियां
- May 3
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Updated: Jun 22

लोई अली ख़लील की कहानियां
उर्दू से अनुवाद : शहादत
आसमान में प्रदर्शन
आज मेरी बेटी ‘शाम’ ने मुझसे सवाल किया कि क्या वह अपनी सहेली लैला से मिलने जा सकती है? वही लैला जो हमारी इमारत की सबसे ऊपर वाली मंज़िल में रहती है। मैं लम्हे भर के लिए ठहरा, फिर जवाब देने से पहले एक झिझक-सी शरीर में तैर गई। मुझे उसकी वह गैर-कानूनी क़ैद याद आई और उसकी वह मानसिक स्थिति भी, जो उन दिनों उस पर हावी थी। इसलिए मैंने हामी भर ली, मगर इस शर्त पर कि मैं ख़ुद उसे वहाँ छोड़कर आऊंगा। मेरी बात सुनते ही वह यूँ उछल पड़ी जैसे ज़िंदगी लौट आई हो। वह भाग कर दरवाज़े तक गई, जूते पहने और चिल्लाने लगी :
‘बाबा जल्दी कीजिए! देर हो जाएगी।’
मैंने भी उलझन का स्वांग भरा, उसका नन्हा हाथ थामा और ख़ामोशी और एहतियात के साये में हम बाहर निकल आए। उसे सहेली के हवाले किया और कहा कि ठीक एक घंटे बाद मैं उसे लेने आऊंगा।
मैं अपार्टमेंट की उस वहशत-ज़दा ख़ामोशी में तन्हा लौट आया। सीढ़ियों की खिड़की से गली की तरफ़ झांकने की जुर्रत न हुई, कहीं ऐसा न हो कि गली के नुक्कड़ पर बैठा वह ‘शिकारी जाग रहा हो... वह स्नाइपर!
‘मोअज़्ज़िमिया में ये निशाना-बाज़ नमूदार हुए अब हफ़्ते से ऊपर हो चला था। दूसरे प्रदर्शन की शुरुआत के साथ ही सिपाही और उनके कारिंदे क़स्बे की गलियों और कूचों में यूं फैल गए थे जैसे कैंसर के वायरस जिस्म में फैलते हैं। उस छोटी-सी बस्ती की ज़मीन पर नाके-ही-नाके उग आए थे। पिछले एक हफ़्ते से प्रदर्शनों की वे आवाज़ें भी थम गई थीं... पूरी बस्ती किसी प्राचीन क़ब्रिस्तान की तरह ख़ामोश थी।
बैठे-बैठे दिल में एक हूक-सी उठी, उन प्रदर्शनों वाले नौजवानों की याद सताने लगी। मैं उनमें से अक्सर को नाम से तो नहीं जानता था, मगर उनके चेहरे, जिनमें उम्मीद के दीये जलते थे, हमेशा जाने-पहचाने और दिल के क़रीब लगते थे। मुझे हाथों में हाथ डाले बहने वाले उस पसीने की याद आई जो हमारी त्वचा के नीचे बह जाता था। मुझे अपने पड़ोसी अबू अबादो का वो कंधा याद आया, जिससे कंधा मिलता था, सईद गुनाम की सिगरेट की वो महक और अब्दुल हादी का वह तबला जिसकी थाप हमारे लहू को गर्मा देती थी। मुझे अपनी ही आवाज़ों की याद आई, जो समुद्र की लहरों की तरह गरजती थीं :
‘आज़ादी... आज़ादी...’
अभी मुश्किल से आधा घंटा ही बीता होगा कि दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई। मैं हैरान रह गया जब शाम तेज़ी से अंदर आई, अपने कमरे की तरफ़ लपकी और स्कूल के बस्ते से रंगीन गत्ते, पैमाना, क़ैंची, मार्कर और धागों का एक गुच्छा निकाल लाई। फिर अपनी उसी कोमल और प्यारी आवाज़ में, जिसके आगे मैं हमेशा हथियार डाल देता हूँ, कहने लगी :
‘बाबा... क्या मैं ये सब अपने साथ ले जाऊं?’
मैंने अपनी आदत के अनुसार सिर हिला दिया और उसे दोबारा सहेली के घर छोड़ आया।
अभी हमारा तय किया गया घंटा पूरा भी न हुआ था कि ‘मोअज़्ज़िमिया’ की शांति गोलियों की तड़तड़ाहट से छलनी हो गई। यूँ लगा जैसे सिपाही दीवाने हो गए हों, जैसे किसी जुलूस ने उनके वजूद को ललकारा हो, मगर अजीब बात थी कि कोई इंसानी आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी। न कोई तकबीर, न तबले की थाप और न ही कोई नारा। मेरे कान किसी भी इंसानी आहट को नहीं सुन पा रहे थे। मैंने पर्दे की ओट से खिड़की की झिर्रियों में झाँका तो देखा कि सिपाही आसमान की ओर बंदूक़ें ताने दीवाना-वार गोलियां बरसा रहे हैं। मुझे उनकी इस हरकत पर बेहद ताज्जुब हुआ।
कुछ देर तो मैं हैरत की उस स्थिति में बुत बना रहा। फिर एक अजीब-सा एहसास, जैसे कोई ईश्वरीय इशारा हो, मुझे कोठे की ओर खींचने लगा। मैं तेज़ी से ऊपर भागा, दिल में एक धड़का-सा लगा था कि शाम वहीं होगी, और डर था कि मेरा यह अंदेशा सच न साबित हो जाये। चौथी मंज़िल पर पड़ोसी के घर के पास से गुज़रा तो दरवाज़ा खुला पाया, ख़ौफ़ की लहर ज़्यादा गहरी हो गई।
मैं जब छत पर पहुंचा तो जो मंज़र देखा.. मेरी आँखें पथरा गईं। मैंने शाम और उसकी सहेली लैला को देखा। मैं ज़्यादा आगे बढ़ने की हिम्मत न रखता था। मंज़र बहुत जलील और हैरान करने वाला था। शाम और लैला छत की मुंडेर के पीछे छिपी हुई थीं, अपने नन्हे हाथों में डोर थामे, हवा में तैरती दो रंगीन काग़ज़ की ‘गुडियों’ को नचा रही थीं।
और सिर्फ वही नहीं, आसमान पर तो पतंगों का एक मेला सजा था। रंग-बिरंगी डोरें और पतंगें जो ख़िज़्र के घर, रजब की इमारत, शेख़ के मकान और गुनाम और ख़तीब की छतों से बंधी हवा में लहरा रही थीं। मैंने देखा कि ‘मोअज़्ज़िमिया’ के सारे बच्चे छतों के पिरामिड आए पर चढ़ आए हैं! मोअज़्ज़िमिया का आसमान काग़ज़ी जहाजों से भर गया था और हर पतंग पर सिर्फ एक ही लफ़्ज़ लिखा था :
(आज़ादी)।
अचानक मुझे अपनी उँगलियों के बीच वही पसीना बहता महसूस हुआ, अबू आबदो का कंधा मेरे कंधे से जुड़ा महसूस हुआ, सईद गुनाम की सिगरेट की महक मेरी सांसों में घुलने लगी और अब्दुल हादी का तबला मेरे कानों में गूंजने लगा। आसमान से एक ही आवाज़ गरजती हुई महसूस हुई—
आज़ादी... आज़ादी... आज़ादी...
और फिर.... गोलियों की बारिश होने लगी।
रोटी की महक
या अल्लाह! रोटी की महक भी किस क़दर प्राणदायक होती है!
मैं किस क़दर बेताब हूँ कि अपनी अम्मा का चेहरा देखूँ, जब उनकी नज़र उन गर्मा-गर्म रोटियों पर पड़ेगी तो यक़ीनन वह मुझे माफ़ कर देंगी। जब वह ये सोंधी ख़ुशबू सूंघेंगी तो जान जाएंगी कि मैं उनसे कितनी मुहब्बत करता हूँ। वह समझ जाएंगी कि मैं वही कर रहा हूँ जो अब्बा जान अपनी शहादत से पहले किया करते थे। वह मान लेंगी कि अब मैं कोई अनपढ़ नहीं रहा, बड़ा हो गया हूँ.. पूरे दस बरस का, अपने भाई मलिक से पूरे सात बरस बड़ा।
शुक्र है कि वह नहीं हुआ जिसका धड़का अम्मा को लगा रहता था।
हुआ तो बस वही जिसकी मुझे उम्मीद थी। मैंने ‘रौज़ा’ की सड़क को पार किया और गलियों के बीचों-बीच यूँ फुर्तीली गति से गुज़रा कि वह जो ताक़ में बैठा शिकारी (स्नाइपर) है, उसकी नज़र मुझ पर न पड़ सकी। मैं पूरी ताक़त से भागा और दोस्त कहते हैं कि मैं बहुत तेज़ भागता हूँ। मेरा अनुमान है कि मेरे नन्हे वजूद ने मुझे उसकी बुरी नज़र से बचा लिया। उसने मुझे देखा ही नहीं और शुक्र है कि असद चचा ने मुझे चार पूरी रोटियां थमा दीं। हमारे लिए हफ़्ता भर को काफ़ी होंगी। मेरे, अम्मां, भाई मालिक, फूफी और दादी के लिए... ये रोटियां देखकर वे सब किस क़दर खुश होंगे।
पांच दिन बीत गए कि हम घास-फूस पर गुज़ारा कर रहे हैं। अम्मा बाहर निकलने से डरती हैं कि कहीं वह निशाना-बाज़ हमारा शिकार न कर ले, जैसा कि उसने हमारे पड़ोसी अब्बू मुहम्मद और शेख़ साहब की बेटी मरियम के साथ किया...। मगर शुक्र है, सब ख़ैर रही और अब ये नेमत मेरे हाथों में है।
या अल्लाह! रोटी की महक किस क़दर प्यारी है, मेरी माँ!
मैं उसी रास्ते से लौटूंगा जहां से आया था। उस गली को यूं पार करूंगा कि इस शिकारी को ख़बर भी न हो। रोटियों को सीने से भींच लूंगा और हवा हो जाऊंगा। वो देखो, गली सुनसान पड़ी है। अब मुझे निकलना चाहिए... एक, दो... तीन...।
भागते हुए हवा के झोंके रोटी की ख़ुश्बू मेरे नथुनों में बसाए दे रहे हैं। सुब्हान-अल्लाह, क्या ही उम्दा ख़ुश्बू है मगर मैं उसमें से एक टुकड़ा भी नहीं चखूंगा, जब तक कि अम्मा और नन्हा मालिक न खा लें। घर पहुंचने तक मुझे इस शानदार अंगेज़ ख़ुश्बू को बर्दाश्त करना होगा।
आह!
यह क्या हुआ? मैं ज़मीन पर क्यों आ रहा? ये रोटियां मुझसे दूर क्यों बिखर गईं? याद पड़ता है कि मेरे दाएं घुटने में किसी चीज़ ने ज़ोर से काटा था और पलक झपकते मैं ख़ाक नशीन हो गया। या अल्लाह, मेरा घुटना तो छलनी हो गया! लहू है कि रवां है! लगता है इस बार मैं उस शिकारी की नज़र से बच न सका। यक़ीनन यह उसकी गोली थी, जिसने ये कारस्तानी की। क्या उसने देखा नहीं कि मैं अभी बच्चा हूँ? क्या उसने मेरे हाथों में रोटियां नहीं देखीं? क्या उसे ख़बर नहीं कि हमने कई रोज़ से कुछ नहीं खाया?
ख़ैर, अजीब बात है कि मुझे दर्द का एहसास नहीं हो रहा, बस मेरा पांव सुन्न हो गया है। अगर वह शिकारी मेरे सामने होता तो मैं उसे ज़बान चिढ़ाकर ग़ुस्सा दिलाता.. मगर मैं अपनी अम्मा को क्या जवाब दूंगा? वह बहुत दुखी होंगी, मुझ पर ख़फ़ा होंगी कि मैंने उनका हुक्म टाला। वह कहेंगी, ‘मैंने तुझे रोका था, वह शिकारी किसी को नहीं बख़्शता, न बच्चे को न बूढ़े को, मगर तूने मेरी ना-फ़रमानी की।’
या अल्लाह... अब क्या करुं? मैं नहीं चाहता कि मेरी माँ रोये।
मैं रेंगकर उन रोटियों को दोबारा समेट लूंगा, और किसी तरह फलांगता हुआ घर पहुँच जाऊंगा। वहाँ अम्मा मेरे घुटने का इलाज कर देंगी। मेरी माँ सब जानती है; मेरा पाजामा फट जाये तो मिनटों में रफ़ू कर देती है, कुर्सी टूट जाये तो जोड़ देती है, बस्ते का दस्ता टूटे तो जाने किस जादू से ठीक कर देती है। मेरी माँ तो हर बिगड़ी चीज़ को संवारने वाली मसीहा है, वह मेरा घुटना भी मिनटों में जोड़ देगी।
यह दोबारा क्या हुआ? अब तो आँख खोलना भी दुश्वार है। जैसे नींद से बोझल हूँ.. और दूसरे घुटने में भी वही कटीली चुभन! यक़ीनन ये दूसरी गोली है! क्या उस शिकारी के पास मेरे सिवा कोई और निशाना नहीं? अब तो रेंगना भी मुहाल दिखता है। रोटियां मुझसे दूर हो गई हैं, मगर उनकी महक अब भी मेरे सांसों के क़रीब है।
आह! रोटी की ख़ुशबू किस क़द्र दिल आवेज़ है माँ!
सामने दीवार के साये में कुछ हलचल-सी महसूस होती है। देखता हूँ कि कुछ नौजवान एक ऊँची दीवार की ओट में छिपे मुझे इशारे कर रहे हैं। आवाज़ तो नहीं आती, मगर उनमें से एक के हाथ में रस्सी है। उसने हवा में रस्सी घुमाई और मेरी ओर फेंकी, मगर मेरे हाथ उस तक नहीं पहुंच पाते। गुमान है कि वे मुझे खींच कर शिकारी की ज़िद से दूर करना चाहते हैं। मगर उन रोटियों का क्या होगा? उन्हें कौन बचाएगा? क्या मैं इतनी मशक़्क़त के बाद ख़ाली हाथ माँ के पास जाऊंगा? रोटी के बग़ैर तो मैं रस्सी हरगिज़ नहीं थामूंगा।
वह नौजवान बार-बार रस्सी फेंक रहा है और हर बार वो मुझसे दूर गिरती है। अचानक एक दूसरा नौजवान नमूदार हुआ। उसने पहले को हटाया और ख़ुद तीर की तरह मेरी तरफ़ लपका। उसने मेरा हाथ थामा ही था कि एक भयानक आवाज़ गूंजी, और वह नौजवान मेरे सामने ढेर हो गया। उसके सिर से ख़ून का फ़व्वारा फूट पड़ा। मैं उससे नज़रें नहीं हटा पा रहा, वह मेरे पहलू में गिरा है, उसका चेहरा मेरे चेहरे के क़रीब है, आँखें खुली-की-खुली रह गईं, चेहरे पर हैरत के आसार जमे हुए हैं, जैसे मौत ने उसे अचानक आ लिया हो। उसका लहू ज़मीन पर फैलता हुआ रोटियों तक जा पहुँचा। ख़ून की बू बहुत भारी और बोझल है, मेरे नथुनों में घुसी चली आती है। अब रोटी की महक ढ़ूंढ़े नहीं मिल रही।
मेरा ख़्याल है कि शिकारी अब किसी को मेरे क़रीब नहीं आने देगा। अब एक ही सूरत बाक़ी है कि मैं ख़ुद रेंगूं, रोटियों को सीने से लगाऊं और उन नौजवानों तक पहुंच जाऊं, जो मुझे बुला रहे हैं। मैं जब अम्मा तक पहुँचूंगा तो वह मेरा पांव आसानी से ठीक कर देंगी।
मैंने रोटियों को फिर से सीने से लगाया। उनकी ख़ुश्बू ने मुझे फिर से जी उठने का हौसला दिया। जी चाहता है कि एक निवाला तोड़कर दांतों में दबा लूं, मगर नहीं, माँ से पहले हरगिज़ नहीं। आह! मेरी माँ ये रोटी की ख़ुश्बू कितनी हसीन है!
आह!
अब तो कुछ दिखाई नहीं देता। दोनों कंधों के बीच शदीद दर्द उठा है। लगता है ये तीसरी गोली है। अब हरकत करने की ताकत नहीं रही। यूँ लगता है जैसे च्यूंटियों की क़तारें मेरे पैरों से होती हुई ऊपर चढ़ रही हैं। या अल्लाह.. मेरी माँ बहुत दुखी होगी अगर मैं न पहुंचा, जब उसे पता चलेगा कि मैंने उसकी नसीहत न मानी और रोटी की ख़ातिर निकल खड़ा हुआ। ऐ मेरे रब! उसे ग़मगीं न करना, उसका दर्द कम कर देना। उसे याद दिलाना, जो उसने मुझसे कहा था कि ‘तेरे अब्बा हमसे पहले जन्नत में सिधार गए हैं।’ उसे बता देना कि मैं अब वहीं अब्बा से मिलने जा रहा हूँ और हम दोनों वहाँ उसका इंतज़ार करेंगे।
अब न कुछ सुझाई देता है, न सुनाई देता है.. बस एक गहरा सुकूत है। सिर्फ़ एक चीज़ बाक़ी है.. रोटी की महक।
मैं उसे चखने के लिए बहुत बेचैन हूँ। मुझे माफ़ कर देना माँ, मरने से पहले मैं एक छोटा-सा निवाला चख लूं।
या अल्लाह! रोटी का ज़ायक़ा किस क़दर लज़ीज़ है, ऐ ख़ुदा!
(वसीम अहमद अलीमी द्वारा अरबी से किए गए उर्दू अनुवाद पर आधारित)
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सीरियाई मूल के लेखक लोई अली ख़लील वर्तमान में क़तर में रहते हैं। अब तक उनके पाँच उपन्यास, दो कहानी संग्रह, चार लघुकथा संग्रह और आलोचना-शास्त्र पर दर्जन भर पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अपने विपुल साहित्यिक कार्यों के लिए वह सुआद अल-सबा पुरस्कार, अरब लेखक संघ पुरस्कार, अल-बत्तानी पुरस्कार, ख़लीफा शैक्षिक पुरस्कार और क़तर फाउंडेशन वैज्ञानिक पोस्टर पुरस्कारों सहित विभिन्न सम्मानों से सम्मानित हो चुके हैं।
शहादत युवा कथाकार और अनुवादक हैं। अब तक उनके दो कहानी संग्रह ‘आधे सफ़र का हमसफ़र’ और ‘कर्फ़्यू की रात’ प्रकाशित हो चुके हैं। अनुवाद की उनकी दो पुस्तकों में ज़हीर देहलवी की आत्मकथा ‘दास्तान-ए-1857’ और मकरंद परांजपे की लिखी महात्मा गांधी की जीवनी ‘मृत्यु और पुनरुत्थान’ प्रकाशित हो चुकी हैं। उनका पहला उपन्यास ‘मुहल्ले का आख़िरी हिंदू घर’ प्रकाशय है। ईमेल : 786shahadatkhan@Gmail.com
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