सन्नाटे का भविष्य
Updated: Jul 8

मूल कहानी : किम एरन
अंग्रेज़ी से अनुवाद : विजय कुमार यादव
मेरा एक पुराना नाम है। बहुत लंबा नाम। उस नाम को बोलने के लिए एक पूरी ज़िंदगी चाहिए। लेकिन इसके लिए एक पूरी ज़िंदगी भी बहुत छोटी हो सकती है—इस नाम को बोलने के लिए आप सैकड़ों, हज़ारों साल तक कोशिश कर सकते हैं और अगर उसमें सफल हो भी गए तो देखेंगे कि इस प्रक्रिया में मेरा नाम दोगुना लंबा हो गया है। यही वजह है कि मैं खुद भी इसे कभी याद नहीं रख पाया। जब भी मैं अपने नाम के बारे में सोचता हूँ, तो अपनी याददाश्त को खंगालने की कोशिश करता हूँ कि मेरा नाम क्या था या फिर उसका कोई अंश क्या रहा होगा। तब कुछ सूत्र हाथ लग जाते हैं।
मैं समझ नहीं पाता कि मैं कौन हूँ और यह भी नहीं जानता कि और मेरी आयु कितनी है।
जन्म के समय का पहला क्रंदन, शायद यही मेरा नाम था। मृत्यु से ठीक पहले नि:सारता की ओर संकेत करती निराशा की एक अस्पष्ट बड़बड़ाहट, शायद यही मेरा नाम था। जटिल वाक्य विन्यास में सरल प्रेम, शायद यही मेरा नाम था। मन के बाँध को तोड़ने वाले दुख से उफनते शब्द, शायद यही मेरा नाम था। मैं अपना नाम याद नहीं रख सकता लेकिन आपको यह बता सकता हूँ कि मैं कौन हूँ। बहरहाल, आप जो भी हों, मेरी भाषा भी शायद आपको अपनी भाषा ही लगेगी।
मैं आज पैदा हुआ हूँ और जल्द ही विलुप्त हो जाऊँगा। हम में से हर एक के पास जीने के लिए एक दिन है। हम जिस दिन पैदा होते हैं, उस दिन हमारी आयु एक दिन की होती है। हम एक-एक दिन बड़े होते जाते हैं और एक दिन बूढ़े होकर मर जाते हैं। वह एक दिन किसी प्रजाति के इतिहास जितना लंबा होता है, उतना ही एक जम्हाई जितना छोटा भी होता है। जिस क्षण हम पैदा होते हैं, उसी क्षण से अपनी पृष्ठभूमि और इतिहास में साँस लेने लगते हैं। हम एक जन्म में पैदा होते हैं और उसी जन्म में मर जाते हैं। जब हम अपनी भाषा के विशिष्ट शब्दों का उच्चारण करते हैं तो समय और स्थान हमारी ओर बढ़ते हैं, समय की दूरियाँ हमारी ओर लपकती हैं, बड़े-बड़े पत्थर पानी में उछलते हैं। अपनी भाषा को पुराना मान लें तो शायद यह बात उसके लिए भी सच है।
मुझे पता नहीं कि मैं कौन हूँ और हमारी संख्या कितनी है।
किसी भाषा के विलुप्त होने के क्षण उसके आवेगों से नि:सृत सांस और ऊर्जा की आत्मा हूँ मैं। मैं एक विशाल नेत्र हूँ, एक विशाल मुँह हूँ। मुझे एक दिन की जिंदगी मिली है, एक संक्षिप्त अवधि जिसमें मैं अपने पूर्व जीवन की ओर मुड़ कर देखता हूँ। मैं एकवचन और बहुवचन दोनों हूँ, एक समूह और उसका हिस्सा हूँ। कोहरे का समूह और उसका पृथक-पृथक गुच्छ हूँ। मैं उन सभी का संश्लेषण हूँ जो मेरे होने में मेरी मदद करते हैं और मैं उस सन्नाटे का गुरुत्व हूँ जिससे ऐसे संश्लेषण खुद-ब-खुद मिट जाते हैं। मैं अनुपस्थिति का परिमाण हूँ, हानि का घनत्व हूँ और प्रकाश के टिमटिमाने तथा उसके बुझ जाने के समय उत्पन्न बल हूँ। मैं जानवरों के सड़ते शरीर और सड़ते हुए भोजन से उत्पन्न उष्मा हूँ।
मैं यह जानना चाहता हूँ कि मैं कौन हूँ और कहाँ रहता हूँ।
मैं बादल की तरह हल्का हूँ, हवा की तरह आज़ाद हूँ और लगातार गतिमान हूँ। मैं अपने जैसों को पागलों की तरह गले लगाता हूँ। क्या आप जानते हैं कि आत्माएँ प्रेम करती हैं? और प्रेम करने के बाद जब हम विलग होते हैं तो मैं तब तक फैलता रहता हूँ, जब तक शब्दों की छाया से ज़मीन को ढक नहीं लेता। मैं आदि और अंत हूँ, अज्ञात और ज्ञात हूँ, वस्तुत: हर चराचर का गीत हूँ, लेकिन उसके साथ ही कुछ भी नहीं। यही एकमात्र तरीका है जिससे मैं खुद को समझा सकता हूँ—मुझे लगता है कि मैं अन्य जनजातियों में से एक के वाक्य विन्यास का सहारा ले सकता हूँ, लेकिन इससे कोई अंतर नहीं पड़ेगा। हमारा कोई मूर्त शरीर नहीं है, हमारी कोई आकृति नहीं है। लेकिन हम जानते हैं कि हम कौन हैं और क्या हैं।
आज मैं एक अकेली भाषा को बोलने वाले एक अकेले वक्ता को मृत्यु के द्वार पर छोड़ आया। वह एक बूढ़ा व्यक्ति था, जिसके गले में अंतिम-चरण का कैंसर था। आबनूस की तरह काले उस व्यक्ति की घनी भौंहें झक सफेद थीं। उसके गले में एक छोटा सा छेद था, जिससे वह बोलता था। उसके गले में लगा वह छोटा, गोल यंत्र मेरा आखिरी ठौर था। निश्चित रूप से, मैं उसकी छाती, सिर और आँखों में भी बसा हुआ था। लेकिन भला हो उसकी साँसों, उसकी मांसपेशियों और उसकी इच्छा शक्ति का, जिनकी बदौलत मैं अपने स्वाभाविक रूप से बाहर घूमने-फिरने में सक्षम था। लेकिन दूसरों के साथ संबंधों में कभी-कभी लगने वाले पेंच और अक्सर होनेवाली वे विफलताएँ थीं, जिनके सहारे ही मैं हृष्ट-पुष्ट हुआ। वह तो यही चाहता था। बचपन में वह एक कुशल धावक था। उसका बचपन का सपना था कि वह अपनी दो टाँगों के बल पर जितनी दूर जा सके, जाए। बहुत बाद में जाकर उसका यह सपना साकार हुआ। वह सपना, जो उसने ठीक बीस साल तक संजोए रखा था। लेकिन बहुत दिनों तक दौड़ने, बहुत दिनों तक चलने, फिर और भी दौड़ने और चलने के बाद वह सबसे दूरवाले जिस स्थान पर पहुँचा, वह स्थान उसका पारिवारिक घर था। नब्बे वर्ष की आयु में उसका जीवन समाप्त हो गया।
अपनी आँखें हमेशा के लिए मूँदने से पहले उसने शून्य में देखा और एक हल्की-सी आह भरी। शायद ये उसके मुँह से निकले आखिरी शब्द थे। लेकिन कोई उसे समझ नहीं पाया क्योंकि बूढ़ा आदमी उस भाषा का आखिरी जीवित वक्ता और श्रोता था।उसके गले से एक अजीब, अस्थिर, यांत्रिक आवाज निकलती रही। यदि आप वह भाषा जानते होते तो भी आपको बहुत ध्यान से सुनना पड़ता कि वह क्या कहने की कोशिश कर रहा है। उसकी आवाज दो रेडियो स्टेशनों के बीच गड्ड-मड्ड होकर किसी रेडियो सेट से निकलती आवाज की तरह लग रही थी। तो भी उसे पता था कि वह क्या कह रहा है। वह मना रहा था कि काश वहाँ कोई और होता जो उसकी भाषा समझता! उसके तईं सुनने वाले की उम्र कोई मायने नहीं रखती थी, न ही मायने रखता था उसका लिंग, पेशा और स्वभाव। उसके लिए यह भी मायने नहीं रखता था कि सुननेवाला संत है या कोई पागल अपराधी। वह बस चाहता था कि कोई उसकी बात सुने, उसकी ओर देखे, सिर हिलाए और उसकी मातृभाषा में यह कहे “न जाने कितने दिनों के बाद किसी से बात करने का मौका मिला है”या यह कहे” यह इतनी दोस्ताना, नैसर्गिक भावना है कि मेरी आँखों में आँसू आ गए हैं।’ या फिर बस एक साधारण ‘हाँ’ या ‘अवश्य’ ही कह दे।
यहाँ के अधिकांश लोग बीमार हैं। आखिरकार ज्यादातर लोग बूढ़े जो हो गए हैं। उनमें से एक अंधी बुढ़िया है, जिसकी स्मरण शक्ति अद्भुत है और है एक बुजुर्ग व्यक्ति, जिसे डिमेंशिया है। उसे आप हर दिन छह अलग-अलग आदिवासी भाषाओं में बड़बड़ाते सुनेंगे, जो उसने बचपन में सीखी थीं। यहाँ एक भूतपूर्व जादूगर भी है, जिसके कान में काफी समय से संक्रमण है। अब उसे वह सम्मान नहीं मिलता, जो पहले मिला करता था। इसके अलावा वहाँ एक योद्धा हैजो कभी शहर जाकर नागरिक बनने का सपना देखता था, लेकिन अब वह सपने नहीं देखता और केवल मिठाई के रूप में मिलने वाले सोडा की प्रतीक्षा करता है। इनमें से प्रत्येक व्यक्ति अपनी भाषा धाराप्रवाह बोलने वाला आखिरी वक्ता है। यहाँ के अधिकांश लोग ऐसे ही हैं। उन्होंने बहुत पहले ही यह समझ लिया था कि वे एक ऐसे संसार में रहते थे जहाँ उनकी मातृभाषा जोर से और स्पष्ट रूप से बोली जाती थी। लेकिन अब उनमें से हर व्यक्ति ऐसे रोते हुए बच्चे की तरह हो गया था, जो बाज़ार के शोरगुल में अपनी माँ से बिछड़ गया हो। अंत में प्रत्येक भाषाई वर्ग के बोलनेवालों में एक को छोड़कर सभी मर चुके थे। प्रत्येक भाषा का केवल एक व्यक्ति बचा था और बची थी उसकी भाषा जो अत्यंत सुंदर और बेहद उत्कृष्ट थी, परंतु यह भाषा एक अकेले व्यक्ति के लिए असहनीय हो गई थी। उन्होंने उस अज्ञात अंधकार और मौन की गहराइयों में यह समझने की कोशिश की कि उनके साथ क्या हुआ था। वे अपने दिन काटते समय यह सोच कर स्वयं को खुश रखनेकी कोशिश करते थे कि दुनिया में कोई भी आदमी उनकी भाषा बोलने वाला अकेला जीवित व्यक्ति हो सकता था, और यह तो बस उनका दुर्भाग्य था कि वे वही व्यक्ति थे। उन्हें खुद को यह यकीन दिलाना था कि यही सचाई है और यह कभी नहीं बदलेगी। कुछ को इस सचाई को स्वीकार करने में पूरी जिंदगी लग गई। कुछ लोग इस चमत्कार की उम्मीद में जीवन के अंतिम क्षण तक आशावादी बने रहे कि किसी दिन कोई आएगा और जनजातीय भाषा में उन्हें ‘सुप्रभात’ कहेगा, उनसे इधर-उधर की बातें करेगा और उसके चेहरे पर न दया होगी, न तिरस्कार और न जिज्ञासा। लेकिन हाय! ऐसा कभी नहीं हुआ। यहाँ के लोगों ने ‘अकेलेपन’ शब्द को इतनी मजबूती से जकड़ रखा है कि जब तक यह स्वयं नष्ट न हो जाए, वे इसे छोड़ने वाले नहीं। हर दिन वे अलगाव के ज़हरीले टॉनिक की तरह निराशा की एक खुराक लेते हैं। अपने दुख और सहनशीलता, अपने अलगाव और भय, अपनी आशा और अपेक्षा में उन्होंने अपने अकेलेपन को कड़वे नमक के ढेले में बदलता महसूस किया। और अब वे यह समझाने की भी नहीं सोचते कि इस अकेलेपन के ढेले का स्वाद कैसा लगता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर उनमें से कोई एक भी शब्द उनके मुँह से फिसल कर बाहर आया तो वे अपनी भावनाओं की लहर और शब्दों की बाढ़ में डूब सकते हैं। इन लोगों की कहानियाँ सुनाने के पहले मैं यह यह बताता हूँ कि वे कहाँ रहते हैं।
यह स्थान एक खास इलाके में स्थित है, जहाँ इने-गिने लोग ही आ-जा सकते हैं। यह एक भव्य प्रदर्शनी हॉल्स वाला परिसर है, जिसका वातावरण अत्यंत उत्कृष्ट है। यहाँ का प्रत्येक हॉल एक शिक्षण केंद्र, अनुसंधान प्रयोगशाला और लोकग्राम के रूप में कार्य करता है। इसका आधिकारिक नाम मृतप्राय भाषाओं का संग्रहालय है, और इसे लुप्त होती भाषाओं के संरक्षण और उनकी महत्ता के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से स्थापित किया गया है।
संग्रहालय के लिए इस अलग-थलग पड़े स्थान के चयन (जहाँ केवल तपता हुआ, गेरुए रंग का बंजर मैदान हर दिशा में फैला हुआ है) को लेकर केंद्र के लोगों को भी आश्चर्य हुआ। जब केंद्र ने इस संग्रहालय की योजनाओं की घोषणा की, तो लगभग रातोंरात भारी मशीनें पहुँच गईं। धूल के बादल उड़ाते हुए ट्रांसपोर्टरों ने अपना काम शुरू कर दिया। निर्माण कार्य तेजी से चला और थोड़े ही दिनों में पूरा भी हो गया। निर्माण पूरा होने के बाद श्रमिक वहाँ से चले गए।
अब एक हजार से अधिक वक्ता उस परिसर में निवास करते हैं और वे एक हजार से अधिक भाषाओं के प्रतिनिधि के रूप में उनका संरक्षण करते हैं। वे दिन में संग्रहालय में उपस्थित रहते हैं और रात को अपनी डॉर्मेटरी में लौट जाते हैं। प्रत्येक प्रदर्शनी हॉल में उस विशिष्ट धरोहर को संरक्षित किया गया हैजिसे पीढ़ियों से जनजाति ने संजोकर रखा है। प्रत्येक भाषा का अपना हॉल है, जिसमें उसका वक्ता अपनी पारंपरिक परिधान में उपस्थित रहता है। बहुत ही कम ऐसा होता है कि एक हॉल में दो या अधिक वक्ता मौजूद हों। जिन मुट्ठी भर वक्ताओं के पास कोई संगी है, अकेले रहने वाले उनसे ईर्ष्या करनेलगते हैं—भले ही वे संगी समान लिंग के हों या पूरी तरह अपरिचित हों।
दूसरी ओर, जिनके संगी हैं वे इस चिंता में घुलते रहते हैं कि यदि उनका संगी पहले मर गया तो फिर क्या होगा? यह सचाई है कि भले ही वे एक-दूसरे को पसंद न करते हों, फिर भी कोई अपने संगी को खोना नहीं चाहता क्योंकि उन्होंने दूसरों को अकेलेपन के कारण पागल होते देखा है।
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हज़ारों से ज़्यादा प्रदर्शनी हॉल प्राकृतिक सामग्री और पारंपरिक तरीकों से तथा हर जनजाति की जलवायु की विशेषताओं और दृश्य-विधान के अनुसार बनाए गए हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश हॉलों में कुछ ऐसा है, जो प्राकृतिक नहीं लगता—स्टायरोफोम से निर्मित और सामान्य रंगों से पुती चट्टानें, प्लास्टिक के खजूर के पेड़, लुक आउट प्लेटफॉर्म जिनमें सीमेंट की परतें उन जगहों से झाँकती दिखती हैं जहाँ खंभे फर्श से जुड़े होते हैं, और जनजातियों की विशेषताओं की अनदेखी करते हुए इधर-उधर रखे गए कॉकेशियन पुतले। विभिन्न हॉल मोटे तौर पर मानव निर्मित तालाबों, छोटी पहाड़ियों और बाँस के पेड़ों के बीच घुमावदार रास्तों से जुड़े हुए हैं। उनके बीच सुविधाजनक रूप से स्नैक बार, रखरखाव कक्ष, शयनगृह और सार्वजनिक शौचालय हैं। टिकट बूथ पर मुफ़्त वितरित किए जाने वाले नक्शे पर प्रत्येक भवन की संख्या लिखी हुई है। अधिकांश दर्शकों का भ्रमण प्राय: एक ही क्षेत्र तक सीमित रह जाता है क्योंकि पूरे स्थल को आराम से देखने में कई दिन लग सकते हैं। इतना विस्तृत परिसर बनाने के पीछे इसे डिज़ाइन करने वालों का तर्क यह था कि प्रत्येक जनजाति को अपने लिए पर्याप्त जगह मिलनी चाहिए। अब एक ऐसे देश के बारे में सोचिए जिसकी वर्तमान जनसंख्या तीन भी नहीं है, वहाँ भी शेष बचे लोगों को सदियों से संचित अपने इतिहास और संस्कृति के लिए कम से कम इतना स्थान चाहिए। इस तरह आगंतुकों को यह अहसास होगा कि कुछ 'संरक्षित' किया जा रहा है। भले ही वे समझते हों कि वे जो देख रहे हैं वह मॉडल हैं, असली चीजें नहीं, लेकिन यदि वे यह महसूस करके लौटते हैं कि हॉल मूल रूप से कृत्रिम हैं, तो यह ठीक नहीं होगा।
परिसर का मुख्य आकर्षण एक फव्वारा है। लेकिन इस विशेष फव्वारे से पानी की जगह शब्द निकलते हैं। इसमें एक धातु स्तंभ है, जो एक विशाल काँच के गोले को सहारा देता है, जिसमें छह महाद्वीप उकेरे गए हैं। पारदर्शी गोले के भीतर सभी भाषाओं के अक्षर और चिह्न चमकते हुए स्वतंत्र रूप से तैरते हैं, यह होलोग्राम का कमाल है। लोग स्पॉटलाइट में चमकते इन अक्षरों के आनंददायक नृत्य को देखना पसंद करते हैं, जो दोपहर बारह बजे को छोड़कर भ्रमण-समय के दौरान कभी नहीं रुकता है। दोपहर बारह बजे थोड़ी देर के लिए जब उनका नृत्य रुकता है, तब काँच का गोला किसी खिलते हुए फूल की तरह खुलता है और शब्द पंखुड़ियों के बीच से नीचे गिरने लगते हैं।
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संग्रहालय का रख-रखाव महँगा साबित हुआ। पहले केंद्र को उम्मीद थी कि संग्रहालय देखने आए दर्शकों से होनेवाली आय से संग्रहालय का खर्च निकल आएगा और इसके निर्माण हेतु लिए गए ऋण की चुकौती भी हो जाएगी। लेकिन धूल में सनकर बहुत कम दर्शक इस दूरस्थ स्थान पर आते थे। अगर यह कारों या डायनासोर के जीवाश्मों का संग्रहालय होता, तो शायद ज्यादा दर्शक आते। लेकिन विलुप्त होने का खतरा झेल रही भाषाओं का संग्रहालय देखने कौन आता? चिड़ियाखाना, रोबोट संग्रहालय, या यहाँ तक कि कीड़े-मकोड़ों के संग्रहालय भी क्या इस संग्रहालय के मुकाबले अधिक दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित नहीं करते? और इस तरह यह संग्रहालय लगातार घाटे का शिकार होता गया। टिकटों की बिक्री से प्राप्त आय संग्रहालय के बुनियादी रखरखाव और हजार से अधिक निवासियों को आवास और भोजन की व्यवस्था करने के लिए नाकाफी थी। अंत में, केंद्र ने टिकटों की कीमत दोगुनी करने का फैसला किया, जिससे दर्शकों की संख्या और भी कम हो गई। और अब तो अधिकतम कुछ दर्जन लोग ही रोज आते हैं। इसके बावजूद, हजार से अधिक निवासी हर दिन बस इंतजार करते हुए उन गिने-चुने दर्शकों के लिए तैयार रहते हैं, अपने मलिन प्रदर्शन कक्षों में चुपचाप एक ही स्थान पर पूरे दिन खड़े रहते हैं, उनके हाव-भाव बिल्कुल डाक टिकटों पर छपे व्यक्तियों जैसे होते हैं। और जब दर्शक आते हैं, तो वे जीवंत हो उठते हैं, अपनी मातृभाषा में दर्शकों का अभिवादन करते हैं और गीत और नृत्य का प्रदर्शन करते हैं। एक तरफ उनकी देशज लिपि और पुस्तकों के साथ लोक कलाकृतियों—हैंडल पर ज्यामितीय डिज़ाइन वाला चाकू, रंग-बिरंगे झूमरों वाला सिर का आभूषण, पौधों की डंठलों से बुनी हुई टोकरियाँ, प्रदर्शित की गई होती हैं। जनजातीय गीतों, मंत्रों और इतिहास के सीडी के संकलन विशेष छूट पर उपलब्ध होते हैं।
केंद्र ने इस परिसर की स्थापना उन भाषाओं को संरक्षित करने और उनके प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए की थी, जो दुनिया भर में विलुप्त होने के कगार पर हैं। लेकिन परिणाम इसके उलट निकला और शायद केंद्र की गुप्त मंशा भी यही थी—वे भूलने के लिए शोक मनाते थे, तिरस्कार करने के लिए प्रशंसा करते थे और समाप्त करने के लिए स्मरण करते थे। शायद यह सब प्रारंभ से ही योजनाबद्ध था। आज फिर दीर्घ समय से जीवित भाषा, मेरे आखिरी वक्ता की भाषा, पलक झपकते ही विलीन हो गई। बीते कुछ हफ्तों से ऐसा ही होता रहा है और अब इससे किसी को कोई चिंता नहीं होती। तो मैं अपने आखिरी वक्ता से विदा लेकर यहाँ ऊपर आसमान में हूँ। जब अतीत की परछाइयाँ मेरे मन में आती हैं, तब मैं नीचे देखता हूँ और वहाँ मुझे हवा में उड़ कर पड़ा हुआ एक पुराना प्रवेश टिकट दिख जाता है। सस्ते कागज के उस टुकड़े पर अपने रंगीन पारंपरिक परिधानों में कई वक्ताओं की छवि दिख जाती है। वे सभी मुस्कुराते हुए अपने हाथ हिला रहे हैं। मैं भी उनकी ओर देख कर मुस्कुरा देता हूँ। आखिरकार हमारा काम भी तो यही था—मुस्कुराना और बार-बार मुस्कुराना, हर हाल में मुस्कुराना, जैसे कि हम कभी मरेंगे ही नहीं।
संग्रहालय का समय सुबह 8 बजे से सायं 6 बजे तक है। जैसे ही दरवाजे रात के लिए बंद होते हैं, परिसर की सारी बत्तियाँ बुझा दी जाती हैं और सब कुछ शांत हो जाता है और चारों तरफ काला ही काला दिखता है—ज्वार के समय आधी रात के अंधेरे में डूबे हुए कीचड़ के मैदान की तरह। निचली पहाड़ियों से घिरी डॉर्मेट्रियाँ परिसर के दूरस्थ हिस्सों में स्थित हैं। दर्शकों को दिए जाने वाले पैम्फलेट में इनका उल्लेख नहीं है। शायद ‘मृतप्राय भाषाओं का संग्रहालय’ केंद्र के किसी भी नक्शे पर नहीं दिखता, शायद वास्तविक रूप में यह इस पृथ्वी पर मौजूद ही नहीं है।
डॉर्मेट्रियों में रहने वालों में से प्रत्येक को नियमों का पालन करना होता है, जिनमें बत्तियाँ बुझाने और सोने का समय शामिल है। प्रदर्शनी हॉल में दैनिक उपस्थिति के अलावा उन्हें हमेशा डॉर्मेट्रियों में ही रहना होता है। जैसे ही सूरज ढलता है, वे केंद्र के कमरों में केंद्र द्वारा निर्धारित तरीके से सो जाते हैं। वे केंद्र द्वारा निर्धारित एक समान फूड ट्रे पर खाना खाते हैं और केंद्र द्वारा निर्धारित शौचालयों में अपने दैनिक कर्मों से निवृत्त होते हैं। लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि उन्हें केंद्र का व्यक्ति नहीं माना जाता। उनका अस्तित्व भी अजीब है, किसी समूह चित्र के धुंधले होने के कारण उसमें मौजूद लोगों की भूतिया शक्लों जैसा। उन्हें केंद्र की भाषा सीखने के लिए बाध्य नहीं किया जाता। हालाँकि इससे निवासियों के साथ संपर्क को मानकीकृत करने के कई फायदे हो सकते हैं लेकिन केंद्र को डर है कि वे मानक भाषा को अपनाकर उसे अपनी खुद की बोली बना लेंगे। प्रत्येक भाषा की पृथक विशेषताओं को संरक्षित करने के बहाने प्रशासक एक जनजातीय भाषा को दूसरी के साथ मिश्रित होने पर रोक लगाते हैं।
यहाँ रहने वाले अधिकांश लोग यतीम हैं। यतीम इस अर्थ में कि वे न केवल संग्रहालय में बल्कि बाहरी दुनिया में कहीं भी नितांत अकेले हैं। संग्रहालय में प्रवेश किए जाने के लिए किसी को कई योग्यताओं को पूरा करना होता है। अल्पसंख्यक जनजातियाँ और उनकी भाषाएँ दुनिया भर में बिखरी हुई हैं, लेकिन केवल यह तथ्य संग्रहालय में प्रवेश की गारंटी नहीं देता। किसी भाषा को केंद्र द्वारा स्वीकार किए जाने की शर्त यह है कि उसके दस से कम वक्ता होने चाहिए। मीडिया यह बताता है कि सभी निवासियों से इन योग्यताओं के संबंध में केंद्र उनसे किस तरह का करार कराना चाहता है।
समस्या यह है कि कई निवासियों को इस करार शब्द का स्पष्ट अर्थ नहीं पता। कुछ कहते हैं कि सामयिक भ्रम की स्थिति में उन पर यहाँ स्थानांतरित होने का दबाव डाला गया, अन्य कहते हैं, “करार फॉर्म आखिर किसलिए?” कुछ तो यहाँ तक कहते हैं, “हमें पकड़कर यहाँ लाया गया”, लेकिन अगर वे कहना चाहते हैं कि उन्होंने “बुलावे के लिए आवेदन माँगा था” या “उन्होंने हमें जबर्दस्ती काम पर लगा दिया” या “उन्होंने हमारा शिकार किया”, तो इसकी परवाह किसे है? लेकिन किसी समय जिन शिकायत करने वालों के जवानी के खून में उबाल आ जाता था, अब वे भी उम्रदराज हो चुके हैं और उन्होंने चुप्पी साध ली है। वे अपनी-अपनी भाषा के अंतिम जीवित वक्ता हैं। केंद्र की नीति है कि हर प्रदर्शनी कक्ष को बनाए रखा जाए, भले ही उसके अंतिम वक्ता की मृत्यु ही क्यों न हो जाए।
हर कुछ हफ्तों में डॉर्मेट्रियों और प्रदर्शनी हॉल में एक कमरा खाली हो जाता है। जहाँ अंतिम वक्ता हुआ करता था, वहाँ अब एक पुतला होता है, जो उसकी पारंपरिक वेश-भूषा में होता है, लेकिन उसका आकार बड़ा दिखता है। और विश्वास करें, प्रदर्शनी कक्ष पर केंद्र की भाषा में ‘विलुप्त’ लिखा एक लाल स्टीकर चिपका दिया जाता है।
जो लोग अभी भी जीवित हैं, प्रदर्शनी कक्षों में उनकी दिनचर्या एक समान होती है। वे कमरे के एक कोने में लकड़ी के पुतलों की तरह बैठे रहते हैं और पर्यटकों के आते ही खुद को संभालते हुए तुरंत उठ खड़े होते हैं तथा अपनी भाषा में कुछ शब्द बोलते हैं—एक अभिवादन और शायद अपना नाम और यह कि उन्हें यह नाम किसने दिया। एक प्रदर्शनी कक्ष से दूसरे प्रदर्शनी कक्ष के बीच थोड़ा-बहुत अंतर होता है। एक जनजाति का व्यक्ति अपनी भाषा में यह अभिवादन कर सकता है- “हमारी धरती की आत्मा आपके स्वागत की अनुमति देती है”, तो दूसरी जनजाति का व्यक्ति अपनी भाषा में कह सकता है-“यदि आप यहाँ से गुजरना चाहते हैं तो आपको हमारी पूर्वजों की भाषा अवश्य बोलनी होगी।”
दर्शक एक छोटे ऑडियो डिवाइस के ईयरबड्स के माध्यम से उनके इन अभिवादनों का अनुवाद केंद्र की भाषा में सुनते हैं, इसके बाद वे गाइड के पीछे-पीछे चलते हुए परिसर देखना जारी रखते हैं। वे कभी-कभी कोई अशिष्ट या बचकाना प्रश्न भी करते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं। कुछ लोग ऑडियो डिवाइस का उपयोग ही नहीं करते, बल्कि ‘प्रशंसा’ में डूब जाते हैं, विशेषकर उन प्रदर्शनी हॉलों में जहाँ निर्दिष्ट भाषा के बारे में जानकारी देनेवाला बोर्ड नहीं लगा होता, बल्कि वहाँ ‘अनुवाद योग्य नहीं’ या ‘पुनर्निर्माण किया जा रहा है’ लिखा एक स्टिकर लगा होता है।
ऐसे कक्षों में वक्ता पिंजरे में बंद जानवर की तरह दुबका रहता है, उसका चेहरा अन्य वक्ताओं की तुलना में निश्चित रूप से काफी उदास होता है और दर्शकों को देखते समय उसकी आँखों में एक अतिमानवी चमक होती है। चूँकि ये वक्ता इतने लंबे समय तक जीवित रहे हैं, इसलिए उनका स्वरूप टेस्ट ट्यूब में बंद कर रखे गए कांस्य युग के चावल के दानों की तरह सिकुड़ा हुआ दिखता है—कितनी घिनौनी बात है यह! दर्शकों के बीच ये वक्ता खासे लोकप्रिय होते हैं, क्योंकि दर्शक इन्हें पृष्ठभूमि में रखकर सेल्फी लेना खूब पसंद करते हैं।
विभिन्न जनजातियाँ अलग-अलग तरीके से अभिवादन करती हैं। एक वक्ता दर्शक के गाल से अपना गाल छुला सकता है या उसके पैर अथवा सिर चूम सकता है। लेकिन एक दिन एक वक्ता ने आवेग में आकर अचानक एक पर्यटक की गर्दन पर वार कर दिया था, तब से केंद्र ने वक्ता और दर्शक के बीच के प्रत्यक्ष संपर्क पर प्रतिबंध लगा दिया। वह वक्ता एक दशक से सेंटर के दिशानिर्देशों का पालन करते हुए पर्यटकों का मुस्कुराते हुए स्वागत करता था और कहता था, “क्या शानदार दिन है!” “ कितना सुहाना मौसम है!” या ऐसा ही कुछ। मैं यह कहानी जानता हूँ क्योंकि यह व्यक्ति मेरा अंतिम वक्ता था। उसकी मुट्ठी में कोई तेज धारदार चीज़ थी। यह पता चला कि हमले से कुछ दिन पहले उस व्यक्ति ने अपनी जनजाति के एक सीडी को आधा तोड़कर उसका नुकीला टुकड़ा अपनी शर्ट के अंदर छिपा लिया था। उसने उस धारदार टुकड़े से दर्शक की गर्दन पर वार किया था। पीड़ित अपनी गर्दन पकड़े हुए गिर पड़ा और उसके साथ ही सीडी का टुकड़ा भी फर्श पर गिर गया, जिसकी चमकदार प्लास्टिक की सतह से खून बह रहा था।
कल्पना कीजिए, किसी चट्टान को हटाया जाता है और उसके नीचे से असंख्य कीड़े निकल रहे हैं, कल्पना कीजिए कि दिन के उजाले में वे तेजी से इधर-उधर भागने लगे हैं, तो यहाँ भी भाषाओं का बेबल वैसा ही है। उनका वाक्य विन्यास, काल, और माधुर्य ऐसा है जिसे केवल देवता ही समझ सकते हैं और उसका आनंद ले सकते हैं। यदि आप एक संगीत की स्वरलिपि की पाँच लाइनों पर पुल्लिंग और स्त्रीलिंग, एकवचन और बहुवचन, कर्तृ और कर्म, सामान्य और आदरसूचक शब्दों का स्वरांकन करें तो मानव वोकल ध्वनियों-कंठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दंत्य, अर्धदंत्य ओष्ठ्य और नासिक्य के सप्तक पर एक शानदार ऑर्केस्ट्रा का प्रदर्शन होगा। इनमें हमें स्वर, संकेत और चेहरे के हाव-भाव भी जोड़ने होंगे।
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परिणामी क्रोमैटिक कॉर्ड्स में यह देखा जा सकता है कि देवताओं को नीरसता नापसंद है और मनुष्य समानता बर्दाश्त नहीं कर सकते। मैं अनेकों उदाहरण दे सकता हूँ, लेकिन यहाँ कुछ की ही चर्चा करूँगा, जिनका मुझसे संबंध है और जिनके बारे में मेरे आस-पास की आत्माओं ने मुझे बताया है। एक जनजाति की भाषा में दर्जनों स्वर होते हैं। जब वे गाते हैं, तो उनकी आवाज़ सिकुड़े हुए लाल गले वाले एक विदेशी उष्णकटिबंधीय पक्षी की आवाज की तरह लगती है। बाहरी व्यक्ति के लिए ये ध्वनियाँ कंठ्य ध्वनि मात्र लग सकती हैं, लेकिन इन्हें हजारों वाक्यों में बदल देना मेरे लिए भी एक रहस्य है। एक अन्य जनजाति की भाषा में पिछले जीवन के लिए एक काल का और पुनर्जन्म के लिए एक दूसरे काल का प्रयोग किया जाता है। इन कालों को कैसे स्थिर किया गया, यह कोई नहीं जानता। एक अन्य जनजाति की भाषा में एक ऐसी क्रिया होती है, जो 150 से अधिक तरीकों से परिवर्तित होती है। वह एक क्रिया-शब्द प्रिज्म से परावर्तित और अपवर्तित किरण की तरह है, जो ध्वनि को प्रतिबिंबित करता है और भाषा की आत्मा पर एक इंद्रधनुषी प्रभाव डालता है।
एक अन्य जनजाति के लिए, प्रेम समुच्चयबोधक है और सख्यता एक क्रिया विशेषण। लेकिन अन्य जनजातियों में प्रेम जैसी भावनाओं का कोई नाम नहीं है; इसलिए उनकी भाषाओं में उसके लिए कोई शब्द ही नहीं है। एक जनजाति की भाषा में ‘मुझे तुम्हारी याद आती है’ अभिव्यक्ति के लिए एक अक्षर पर्याप्त है; जबकि दूसरी जनजाति की भाषा में इसके लिए दर्जनों वाक्य चाहिए। आर्कटिक क्षेत्र की एक जनजाति में तो मुँह से निकलने वाली भाप ही शब्दों का काम कर सकती है।
यहाँ का जीवन इसी तरह चलता रहता है। यहाँ के वक्ता, उनके चेहरे और उनकी कहानियाँ उतनी ही विविध हैं, जितनी विविध उनके द्वारा बोली जानेवाली भाषाएँ हैं। एक निरक्षर बूढ़ी गायिका युगों पुराने छंदों को बिना एक भी पंक्ति भूले इस तरह सुनाती है मानो उसका शरीर उस गाथा का ब्रेल टेक्स्ट हो। वह निश्चित रूप से अपनी सुंदरता के लिए मशहूर अरबी बारहसिंगों के लंबे, सीधे सींगों की तरह विलुप्त होने को अभिशप्त है।
यहाँ रहने वाले एक सबसे वृद्ध व्यक्ति ने अपनी युवावस्था में विदेशी भाषाविदों के एक समूह के लिए कुली का काम किया था। नदियों को पार करते और पहाड़ी घाटियों से गुजरते हुए वह उनका विशाल रिकॉर्डर ढोता था। समय-समय पर जब वह उस उपकरण से निकलती अपनी जनजाति के लोगों की आवाज सुनता तो उसे इस बात का गर्व होता कि उसके रोजमर्रा का भार कुछ खास था।
उन दिनों विद्वान आदिवासी गाथाओं को रिकॉर्ड करने के लिए आधा टन एल्युमीनियम डिस्क लेकर चलते थे और यही युवक उनका पथप्रदर्शक बन कर उन्हें दूरदराज के जनजाति वाले क्षेत्रों में ले जाया करता था। उस समय उसे यह अंदाजा नहीं था कि ये शब्द और गीत कितनी जल्दी विलुप्त हो जाएँगे। क्या उसने कभी यह कल्पना भी की थी कि एक दिन वह खुद एक जीवित टेप रिकॉर्डिंग के रूप में प्रदर्शित किया जाएगा।
एक बार संग्रहालय परिसर में एक बच्चा पैदा हुआ। संग्रहालय के स्थापित होने के बाद वहाँ किसी के जन्म लेने का यह पहला मौका था। बच्चे के युवा माता-पिता अलग-अलग भाषा समूहों के थे। सोचने की बात है कि परिसर में निगरानी और नियंत्रण की विशेष व्यवस्था होने के बाद भी यह कैसे संभव हो पाया था? इस घटना के प्रति अपनी बुद्धिमानी दिखाते हुए पुराने निवासी बस सिर हिलाते रहे कि यही तो मानव स्वभाव है, हर दिन का और हर जगह का। प्रसव सहज रूप में हुआ था और हम सभी ने उस नवजात के आगमन पर बड़ी खुशी मनाई। हमारे हृदय नवजीवन की कोमलता और गर्माहट से भर उठे। ऐसा होना स्वाभाविक ही तो था, क्योंकि हममें से अधिकांश उम्रदराज़ जो हो चले थे। केंद्र ने बच्चे के विकास पर निगरानी रखने का फैसला किया और यह निश्चय किया गया कि जब तक केंद्र कोई बड़ा प्रतिबंध न लगाए, तब तक बच्चा माता-पिता के साथ रहेगा। बच्चा कम से कम अपने माता-पिता की देखरेख में तो बड़ा होगा और जनजातीय भाषा सीखेगा। लेकिन युवा माता-पिता इस बात को लेकर चिंतित थे कि उनकी मृत्यु के बाद बच्चा संग्रहालय में अकेला रह जाएगा। वे अच्छी तरह जानते थे कि उनके न रहने के बाद बच्चे को कितना असह्य दुःख सहना पड़ेगा। यह तो खैर उनकी संतान थी, उनका मानना था कि किसी को भी इस तरह की जिंदगी नहीं मिलनी चाहिए।
आखिरकार, मन ही मन उन्होंने बच्चे को छोड़ने का फैसला कर लिया। एक दिन गुपचुप तरीके से उन्होंने बच्चे को केंद्र के एक व्यक्ति के वाहन में डाल दिया। वे चाहते थे कि बच्चा केंद्र के लोगों के साथ बड़ा हो और तमाशा न बनकर केंद्र का व्यक्ति बने। अपने बच्चे को जुदा करना उनके लिए बेहद कष्टदायक था, लेकिन उन्होंने अपने मन को दिलासा दी कि भविष्य में संग्रहालय में अकेला रहने पर उनका बच्चा जिस निराशा और एकाकीपन की यंत्रणा से जूझता हुआ अपने दिन बिताएगा, उसकी तुलना में उनका दर्द कुछ भी नहीं है।
चलिए, अब अपने वक्ता के बारे में बताऊँ। अपनी युवावस्था में वह बहुत तेज दौड़ता था और वृद्धावस्था में उसे गले का कैंसर हो गया था। वह एक साहसी युवक था, जिसने एक बार संग्रहालय से भागने की कोशिश की थी। वह पंद्रह साल की उम्र में यहाँ आया था। एक अजनबी ने उसे शराब पिलाई थी और वह सो गया। जब उसकी नींद खुली तो उसने खुद को इस संग्रहालय में पाया।
कई दिनों तक उसने किसी भी व्यक्ति से अपनी बात कहने की कोशिश की, लेकिन किसी ने उसकी भाषा नहीं समझी। कई बार क्रोध, प्रतिरोध, विनती और निराशा के बाद वह जल्दी ही यहाँ की दिनचर्या में ढल गया। कहने की आवश्यकता नहीं कि पहले कुछ महीनों तक वह उदास और थोड़ा विचलित-सा रहा। फिर एक दिन पर्यटकों के आते ही वह अचानक खड़ा हो गया और गर्मजोशी से भरे ‘नमस्ते’ से उनका स्वागत किया। सहसा इस परिवर्तन पर वह खुद भी चौंक उठा था। उसके बाद तो उसने दर्शकों के स्वागत में ‘नमस्ते’ के साथ ‘आपसे मिलकर खुशी हुई’ और ‘क्या ही शानदार दिन है!’ कहना भी जोड़ लिया।
अपने पैंतीसवें जन्मदिन पर वह कैफेटेरिया में मछली के एक डिब्बे में बची हुई मछली को चम्मच से निकाल रहा था। उसे यह भी पता नहीं था कि डिब्बे में किस प्रकार की मछली थी,वह तो बस इतना जानता था कि इसमें केंद्र द्वारा इस्तेमाल किए जानेवाले पारंपरिक मसाले और कृत्रिम सुगंध मिलाई गई थी। उसे इसकी गंध से मतली आ रही थी। उसे यह गंध फूलों को बर्तन में उबालने की गंध जैसी लग रही थी। शुरू में तो इसे छूने से भी उसका जी भिनक गया था, लेकिन बाद में मछली के तेलयुक्त शोरबे को उँगलियों से चूसते हुए वह अपने आस-पास नजर दौड़ा रहा था।
उसी रात उसने संग्रहालय से भागने की योजना बनाई। वह बहुत दिनों से यहाँ से भाग जाने का सपना अपने मन में सँजोए हुए था। अपने इस गुपचुप पलायन को उसने बड़ी धीरता और सावधानी से अंजाम दिया। वह डॉर्मेटरी की ओर लौटते हुए निवासियों की कतार से चुपके से बाहर निकला, फिर कृत्रिम बाँस के झुरमुट में अपने कपड़े बदलकर दर्शकों की भीड़ में आसानी से घुलमिल गया और किसी की निगाह में आए बिना वहाँ से से बाहर निकल गया। वहाँ से निकल पाना पहले उसे जितना कठिन लगता था, उससे कहीं आसान साबित हुआ। वास्तव में वहाँ से निकल पाना कोई बड़ी बात थी ही नहीं। वह सोच रहा था कि स्वांग वाली जिंदगी की हद से निकल कर वास्तविक जिंदगी में प्रवेश करना जब इतना आसान काम था तो इसे अंजाम देने में उसने इतना समय क्यों लगाया?
केंद्र में सीखे गए कुछ शब्दों के सहारे उसने अपने घर का रास्ता लिया। तारों को देख दिशा का अंदाज लगाते हुए वह लगातार दौड़ता रहा। उसकी एड़ियाँ फटी गई थीं और पैर के अँगूठों से खून बह रहा था, लेकिन उसे इसकी परवाह नहीं थी। अपने घर वापस आकर नए जीवन की कल्पना करते हुए उसने अपना धैर्य नहीं छोड़ा। हालाँकि उसे पक्का यकीन नहीं था कि उसके लोग अभी भी वहाँ मौजूद होंगे। केंद्र ने उसे उसकी जनजातीय भाषा का एकमात्र जीवित वक्ता घोषित किया था। लेकिन यह उनकी एक चाल भी तो हो सकती थी।
बीस साल पहले जब उसने अपना गाँव छोड़ा था, उस समय वहाँ छह वयस्क और तीन बच्चे थे। शायद इस बीच गाँव का आकार बढ़ गया हो। फिर भी एक आशंका ने उसे घेर लिया। जैसे-जैसे वह अपने घर के करीब पहुँचता गया, उसे जले हुए पेड़ों के अधिकाधिक अवशेष दिखने लगे। फिर भी, वह यह सोचकर आगे बढ़ता रहा कि एक बार वह घर तो पहुँच जाए, उसके बाद पूरी रात गाँव वालों से बातें करेगा।
जब दौड़ते-दौड़ते वह थकान से पस्त हो जाता तो उसे उस फल की याद आती, जिसकी मिठास और उसके ताजे रस का स्वाद उसने अपने बचपन में लिया था। अंततः जब वह महीनों के लंबे कष्ट के बाद, गहरी घाटियों और ऊँचे पहाड़ों को पार करते हुए पहुँचा, तो देखा कि पहले जहाँ उसका गाँव था, वहाँ अब धूल भरा अंतहीन बंजर मैदान था। सभी पेड़ काट दिए गए थे और जमीन से बाहर निकले हुए उनके ठूँठ उस स्थान पर अतीत में हुए सर्वनाश की भयावह तस्वीर पेश कर रहे थे।
वह मृतप्राय भाषाओं के संग्रहालय में उसी तरह लौट आया, जैसे उसने भागने के समय किया था। वहाँ के कर्मचारियों ने भिखारी जैसे दिखने वाले उस व्यक्ति की ओर भावशून्य और प्रश्न भरी भरी दृष्टि से देखा। कुछ सामान्य सवाल पूछने के बाद उन्होंने उसे कुछ सरल निर्देश दिए और कीटाणुनाशक का उपयोग कर नहाने का आदेश देते हुए उसे स्नानागार में भेज दिया। उसके बाद कुछ दवाइयाँ लेने के बाद वह अपनी डॉर्मेटरी में लौट आया।
पसीने में भीगा हुआ कई दिनों तक वह गहरी नींद में सोता रहा। बीच-बीच में उसका शरीर बुखार से तपता रहता और अर्धचेतन अवस्था में कभी-कभी वह नींद में बड़बड़ाता रहता। जब वह जागा तो उसे महसूस हुआ कि उसके भीतर बहुत कुछ बदल गया है। जब भी वह कुछ निगलता तो उसे ऐसा लगता, जैसे उसके गले में कुछ अटका हुआ हो, जिसके कारण उसके गले में खराश होती और कानों तक दर्द होने लगता। जब वह बोलता, तो उसकी आवाज़ टूटे हुए रेडियो की खरखराती आवाज जैसी लगती। कई साल बीत गए और जब ट्रांजिस्टर आखिरकार बंद हो गया तो उससे कोई और आवाज़ नहीं निकली।
भीतरी कान की सूजन, गले के कैंसर और डिमेंशिया से जूझ रहे यहाँ के वक्ता शब्दों के प्रति एक प्रबल और आजीवन उदासी से भी पीड़ित रहते हैं। अतीत में जिन सबसे साधारण, सबसे हानिरहित शब्दों को सुनने पर वे उन्हें सहज रूप से लेते थे, अब वे ही शब्द उन्हें झकझोर कर रख देते थे। कोई व्यक्ति अनजाने में अपनी भाषा में ‘दिव्य आड़ू’ कहता और आँसुओं में डूब जाता; और जब कोई ‘ताड़ का पेड़’ बोलता तो उसे यह महसूस होता कि उसका हृदय विदीर्ण हो गया है। शिशुओं की किलकारी और उनकी मुद्राएँ उनमें से किसी आदमी का गला रुँधने पर मजबूर कर देतीं, जबकि ‘वसंती हरित’ या ‘चुंबन’ किसी और आदमी को गहरी आह भरने पर मजबूर कर देता।
मेरा वक्ता उन सभी शब्दों को अलविदा कहना चाहता था, इसलिए लंबे समय तक उसने अपना मुँह बंद रखा। फिर भी, मौन सहमति या हत्या किए जाने के कई दिनों के बाद पानी की सतह पर तैरती किसी आदमी की सड़ी-गली लाश से जुड़े विभिन्न क्षणिक विचार किसी न किसी तरह उसके साथ संवाद स्थापित करने में कामयाब रहे। उसके लिए उसकी मातृभाषा साँस के रूप में ली जानेवाली जीवनदायिनी हवा तथा मनन करने वाले विचार जैसी थी और उसका स्वरूप उसके भीतर अंकित था। यह ऐसी चीज़ नहीं थी, जिसे वह सिर्फ़ यह कहकर मिटा या त्याग सकता था कि वह अब और नहीं बोलना चाहता। यही कारण था कि अपनी भाषा से किनारा करने के अपने प्रयास में वह विफल रहा। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं था कि उसने इस स्थिति के साथ समझौता कर लिया था। अपनी कुछ न बोल पाने के कारण दिन-ब-दिन उसे अकेलापन महसूस होता और जब वह बोलता तो उसका अकेलापन और बढ़ जाता। इसलिए उसने अपना अधिकांश जीवन अपनी भाषा के लिए तरसते हुए बिताया—एक ऐसी भाषा, जिसे अकेले वह नहीं, बल्कि दो लोग बोलें। दो लोगों की जगह तीन या पाँच लोग हों तो और अच्छा। एक ऐसी भाषा, जो निर्रथक परंतु गर्मजोशी से भरी हो और जिसके शब्द मन मोहने वाले, झाँसा देने वाले, मजाक करने वाले, गुस्सा दिलाने वाले, सांत्वना देने वाले, आलोचना करने वाले, बहाना बनाने वाले तथा किसी सबब की पैरवी करने वाले हों। अपनी मर्जी के मुताबिक वह मेरा स्वतंत्र और सहज व्यवहार करना चाहता था। वह उन प्रतिध्वनियों के प्रपात में रहना चाहता था, जो तब उत्पन्न होती थीं जब वह मेरा नाम लेता। उसकी यह मामूली चाहत उसे अक्सर हृदय-विदीर्ण कर देने वाली भावना से भर देती। मरते समय उसने खुद से कहा कि वह अपनी शब्दावली में मौजूद ध्वनियों को व्यक्त करने, स्वादों का वर्णन करने और भावनाओं को चित्रित करने वाले शब्दों की संपदा को कभी नहीं भूल पाएगा। मैंने उसके जिन कथनों के बारे में बताया, वे तब तक पशुओं की जबान की ध्वनियों में तब्दील हो गए थे, लेकिन मैंने फौरन पहचान लिया कि वह जो नाम लेने की कोशिश कर रहा था, वह मेरा ही नाम था।
मुझे याद है कि अपनी आखिरी साँस लेने के पहले वह कैसा दिख रहा था—उसकी देह काँप रही थी और उसके मुँह से यांत्रिक ध्वनि निकल रही थी, जैसे वह मनुष्य न होकर भावनाओं से भरा कोई रोबोट हो। बड़बड़ाते और बुदबुदाते “ऊ-उह-उह”और “हुह-उह-उह” करते समय उसका चेहरा ऐसा लग रहा था, जैसे कोई बर्फीली नदी टूट रही हो। कल्पना कीजिए एक ग्लेशियर की, जो लाखों वर्षों से स्थिर और अडिग रहा हो और अचानक उसमें दरारें पड़ कर बर्फ टूटने लगी हो। उसका हावभाव भी कुछ वैसा ही था—शांत और भव्य। और हालाँकि यह दुर्भाग्यपूर्ण था, लेकिन जो घट रहा था, उसके प्रति वह लगभग उदासीन-सा लग रहा था। उस समय मुझे ऐसा लगा, जैसे मैं कुछ अप्राकृतिक घटना देख रहा हूँ, एक ऐसे संघर्षपूर्ण पतन का गवाह बन रहा हूँ, जिसकी गूँज बाहरी दुनिया तक नहीं पहुँचेगी। और वाक्य पूरा किए बिना ही वह चला गया। जब उसने अपनी आँखें बंद कीं, तो दुनिया अकथित शांति से ढँक गई—कम से कम मेरे लिए तो यह शांतिपूर्ण था। उसी समय मेरे हृदय में एक विचित्र तरह की लालसा, एक अप्रत्याशित इच्छा का उदय हुआ जो अंततः मुझे मेरे जन्मस्थान पर जाने की चाहत में बदल गई।
मैंने एक बार एक ऐसे ग्रह के बारे में सुना था जो इतना ठंडा है कि वहाँ देवता भी नहीं रह सकते हैं। वह ग्रह नीचे रहनेवाले लोगों के आखिरी सपनों और अंतिम चीखों की गाढ़ी पट्टियों से वृत्ताकार घिरा हुआ है। ये चौड़ी, रंगीन पट्टियाँ जनजातीय भाषाओं की आत्माओं से रंगी गई हैं। हमारे बारे में यह अंधविश्वास और किंवदंतियाँ हैं कि मरने के बाद हम पीली धूल और बर्फ के टुकड़े बन जाते हैं। मैं बर्फ की तरह ठंडा कैसे बन सकता हूँ? सोचने में अजीब लगता है यह, लेकिन इस धारणा से ही मैं खुश हूँ कि कहीं न कहीं तो मैं मौजूद रहूँगा। लेकिन अपने आखिरी वक्ता को हरदम के लिए विदा करते वक्त मुझे यह पता चला कि उस ग्रह की कहानी के साथ एक बड़ी समस्या है। हमारी अंतिम मंजिल वह ग्रह नहीं है, जहाँ ठंड देवताओं की साँस तक को भी जमा देती है। सच तो यह है कि हमारे वक्ता की मृत्यु के बाद हमारा अंतिम विश्राम स्थल दूसरी दुनिया नहीं है, यह ब्रह्मांड भी नहीं है, बल्कि धातुओं को गलाने वाली वह भट्ठी है, जो नर्क जैसी गर्म है।
दूर कहीं, मैं कुछ बड़ी आत्माओं को तेज हवा पर सवारी करते देख रहा हूँ, जो उसके एकतरफा प्रवाह में आगे बढ़ती जा रही हैं। लगातार हवा में उड़ते रहने के दरम्यान अचानक वे एक बड़े फनेल में खिंंची चली जाती हैं। दूसरे ही क्षण वे एक भँवर में पड़कर गायब होने लगती हैं। उस समय ऐसा लगता है, जैसे कोई चुंबक लोहे के बुरादे इकट्ठा कर रहा हो। मैं वहाँ नहीं जाना चाहता और वहाँ से हट जाता हूँ, लेकिन वह चुंबक मुझे अपनी ओर खींच रही है। अगले पल मैं नीचे की ओर देख रहा हूँ और अपनी निगाहों के सामने का दृश्य देखकर मंत्रमुग्ध हो गया हूँ।
संग्रहालय को चारों ओर से घेरने वाली छोटी पहाड़ियों के पीछे, सड़कों का अंतहीन सिलसिला हर दिशा में फैला हुआ है। उन सड़कों के दोनों तरफ एक जैसी आकृति और रूप वाली फैक्ट्रियाँ भरी पड़ी हैं। और आश्चर्य की बात यह है कि संग्रहालय पहाड़ियों और डिस्क की आकृति वाले जमीन के टुकड़े के ठीक बीच स्थित है और उसके आगे अनगिनत फैक्ट्रियाँ फैली हुई हैं। पहली बार इस ऊँची जगह से मैं यहाँ की जमीन का भौगोलिक रूप देख पा रहा हूँ।
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मैं कौन हूँ? और मेरे साथ क्या होने वाला है?
मैं पेड़ पर बने चित्र में, चट्टान पर की गई नक्काशी में जन्मा था। पहले मेरा नाम ‘भ्रांति’ था लेकिन समय के साथ और आवश्यकता के चलते लोगों ने मेरा नाम बदल कर ‘समझ’ रख दिया। मुझे अपना नाम या इसका प्रत्येक अंश पसंद था। मैं जटिल व्याकरण, एकवचन और बहुवचन, आरंभ और अंत, समस्त और शून्य में छुपा सरल प्रेम का गीत था। मुझे जीने के लिए एक ही दिन मिला था, तो भी उस एक ही दिन में मैंने पूरी जिंदगी पर नजर डाल ली। मैं विस्तृत हुआ और मेरा नाम लंबा हो गया। यह इतना लंबा हो गया कि समय के लंबे प्रवाह में कोई इसे पूरी तरह से बोल नहीं पाया। लेकिन इस पल मुझे एहसास हुआ है कि किसी दूसरी दुनिया में इसे एक ही शब्द में संक्षेपित किया जा सकता है। कुछ के लिए वह शब्द ‘ऊर्जा’ हो सकता है, कुछ के लिए ‘ईंधन’ तो कुछ और दूसरों के लिए ‘प्राकृतिक संसाधन’। शायद मैं वह हूँ, जिसने इस दुनिया को चलाया है, शायद वह मैं हूँ, जिसके लिए मरना ही उचित समझा गया है। अब जब मैं इस विशाल, रहस्यमयी भँवर में खिंचता जा रहा हूँ, तो मुझे अपने अंतिम शरणस्थल—"मृतप्राय भाषाओं का संग्रहालय” और साथ ही उस अनमोल फव्वारे की याद आती है, जिसके अनूठे काँच के गोले में विभिन्न जनजातीय भाषाओं के स्वतंत्र तैरते अक्षरों और उनके स्वरूपों का होलोग्राम होता है। रोशनी में झिलमिलाते अक्षरों का उल्लासपूर्ण नृत्य दोपहर 12 बजे तक होता रहता है और जब वह नृत्य अचानक रुकता है तब वह गोला एक खिलते हुए फूल की तरह खुल जाता है और शब्द पंखुड़ियों के बीच गिरने लगते हैं। यह दृश्य मुझे हमेशा सुंदर लगता था। लेकिन अब मुझे यह सुंदरता भयावह प्रतीत होती है। मैं देखता हूँ कि काँच का गोला इस सुंदर सपने को इतनी जल्दी खत्म नहीं करेगा। अपनी मृत्यु के एक और चक्र से गुजरते समय मैं खुद को इसे देखने से रोक नहीं पाता।
मैं (किम एरन, इस कहानी की लेखिका) निकोलस इवांस की पुस्तक डाइंग वर्ड्स की आभारी हूँ, जिसमें पुरानी गाथा सुनाने वाली महिला का संदर्भ है और रिकॉर्डिंग उपकरणों के बारे में जानकारी दी गई है।
गोल चक्कर वेब पत्रिका अत्यंत सीमित संसाधनों से चल रही है। इस वेबसाइट के संचालन में आर्थिक सहयोग देने हेतु दिए गए क्यू आर कोड का उपयोग करें :

किम एरन का जन्म दक्षिण कोरिया के इंचियोन में साल 1980 में हुआ था। वह दक्षिण चुंगचोंग प्रांत के सेओसन में बड़ी हुईं। उन्होंने कोरिया नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ आर्ट्स में नाटक लेखन का अध्ययन किया। एरन ने 2003 में अपनी साहित्यिक शुरुआत ‘बिना दस्तक वाला घर’ नामक कहानी से की, जिस पर उन्हें डैसान साहित्य पुरस्कार प्राप्त हुआ। उनके प्रथम कहानी संग्रह ‘दौड़ो पापा’ (2005) को बहुत सराहा गया और इसके लिए उन्हें हांकुक इल्बो साहित्य पुरस्कार प्राप्त हुआ। अब तक उनके चार कहानी संग्रह, दो उपन्यासऔर एक निबंध-संग्रह (एक नाम जिसे भूलना आसान है) प्रकाशित हुए हैं। उनका पहला उपन्यास ‘मेरी धड़कती जिंदगी’ (अंग्रेज़ी में My Brilliant Life नाम से अनूदित) एक 17 वर्षीय लड़के की मार्मिक कहानी है, जो प्रोजेरिया नामक बीमारी से ग्रस्त है, जिससे वह असामान्य रूप से तेज़ी से बूढ़ा हो जाता है। वह अपने माता-पिता, जो किशोर अवस्था में ही उसके माता-पिता बन गए थे, को अलविदा कहने की तैयारी करता है। हाल ही में उनका दूसरा उपन्यास ‘सच्चाइयों के बीच झूठ’ (2024) प्रकाशित हुआ है।
विजय कुमार यादव लेखक एवं अनुवादक हैं। गोल चक्कर पर इनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : विजय कुमार यादव
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