कोलम्बिया नदी : एक शब्द-चित्र
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कोलम्बिया नदी एस्टोरिया में समुद्र से मिलती है। यहाँ उसकी यात्रा समाप्त हो जाती है। किन्तु कोलम्बिया नदी की हमारी यात्रा इसी एस्टोरिया से आरम्भ हुई। हमारे जहाज़ ने समुद्र से नदी में प्रवेश किया और वहाँ हम एक दिन लंगर डाल कर खड़े रहे। जहाँ हम खड़े थे, वहाँ से पीछे की तरफ़ देखने पर समुद्र था और आगे किनारों से बंधी हुई कोलम्बिया नदी। लगभग बीस दिन की यात्रा के बाद हमें पानी के अलावा दूसरी चीज़ें देखने को मिली थीं। यह दृश्य आँखों के लिये सुकून देने वाला था।
हमारे जहाज़ के दाईं तरफ़ किनारे पर कुछ इमारतें और बस्तियाँ थीं। बाईं तरफ़ हरे पहाड़ थे, जहाँ कोई बस्ती नहीं दिखती थी। ठीक सामने नदी को दो धाराओं में विभक्त करती पानी में धँसी हुई एक पहाड़ी थी। हमारे पीछे की तरफ़ नदी के ऊपर खिंचा दाएँ को बाएँ से जोड़ता लोहे का एक लम्बा पुल था जिस पर कारें चल रही थीं। यह पुल एक हिस्से में ऊँचा उठा था जहाँ से होकर जहाज़ नदी में अन्दर या बाहर आ-जा सकें। शेष पुल लगभग नदी की सतह को छूता हुआ चलता था। आगे जाकर यह पुल सड़क में बदल जाता था जो टेढ़ी-मेढ़ी होकर पहाड़ी की भीतरी सतहों में कहीं खो जा रही थी।
पता नहीं एस्टोरिया के लोगों की क्या दिनचर्या रहती होगी। सोचना मुश्किल है कि इतने मनोरम दृश्यों से घिरे होने पर काम करने में मन लगता होगा या नहीं। वैसे तो ऊबने जैसा यहाँ कुछ भी नहीं, फिर भी क्योंकि ऊब तो शाश्वत है और कहीं भी बस जाती है, तो एस्टोरिया के लोग बस्ती और समुद्र से ऊबने पर कार में बैठकर इसी पुल से पहाड़ों की तरफ चले जाते होंगे। देखने पर यह वाक़ई आसान लगता है। मैं बस्ती की तरफ़ देखकर एक ऊबे हुए व्यक्ति की कल्पना करता हूँ। वह कार में बैठता है, कुछ दूर सड़क पर चलने के बाद पुल पर चढ़ता है और बस कुछ ही देर में हरे पहाड़ों में गुम हो जाता है। यह तो वहाँ जाकर ही पता लगेगा पर मुझे लगता है कि पुल के आख़िरी सिरे पर उसकी कार से ऊब नीचे उतर जाएगी और पहाड़ी पर वह फिर से तरोताज़ा हो जायेगा।
एक दिन बाद हम एस्टोरिया से आगे बढ़े। कोलम्बिया नदी पर बढ़ते हुए एस्टोरिया से लांगव्यू तक का यात्रा समय लगभग पाँच-छः घंटों का था। यह मेरे देखे हुए रास्तों में अब तक का सबसे सुन्दर रास्ता था। नदी कभी पहाड़ियों से घिर जाती थी तो कभी किनारों पर कुछ दूर तक समतल ज़मीन दिखती थी। इस ज़मीन के पीछे हरे पहाड़ थे जिनके शिखर ढलते दिन की धूप में चमक रहे थे। इन पहाड़ों के ऊपर वही तिकोने आकार के पेड़ थे जिन्हें हम क्रिसमस ट्री कहते हैं। चट्टानों, पहाड़ों, मोड़ों और कहीं-कहीं पर छिटपुट खेतों से घिरा नदी का यह रास्ता मानो किसी दूसरे लोक की सैर था। किनारों पर बीच-बीच में कहीं कोई मकान भी दिखता था, कभी कोई फैक्ट्री। कभी दूर थोड़ी ऊँचाई पर बल्ब वाली रोशनी में अकेला खड़ा कोई गिरजाघर। किन्तु बसाहट की ये चीज़ें एक साथ नहीं थीं। सब कुछ अलग-अलग हिस्सों में अपने एकान्त को सीने से चिपकाए हुए खड़ा था। अगर आप पहाड़ी पर बने इकलौते मकान की कल्पना करें तो पाएंंगे कि घिरता हुआ अँधेरा यहाँ दो या चार दिशाओं से नहीं बल्कि ज़ाहिर तौर पर छः दिशाओं से तो घिरता ही होगा। इसके अलावा यदि वह मन में भी घिर रहा है तो उसकी सघनता का अन्दाज़ लगा पाना भी मुश्किल होगा। अब यह ठीक-ठीक मालूम करना मुश्किल है कि क्या यह सिर्फ़ पहाड़ों-नदियों-पेड़ों से बनी ख़ूबसूरती थी या इनमें बसा अँधेरा और अकेलापन भी मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। नदी के दोनों सिरों को नदी के अलावा एक और चीज़ भी जोड़ती थी। दोनों सिरों पर लगे खम्भों से होकर बिजली के तार जाते थे। हमारा जहाज़ उन तारों को लगभग चूमता हुआ गुज़र रहा था।
लांगव्यू पोर्ट के पास नदी की चौड़ाई अच्छी-ख़ासी थी। हमारा जहाज़ एक किनारे पर बंधा था। किनारे पर ही पास में कोई फैक्ट्री थी जिससे बादल जैसा सफ़ेद गाढ़ा धुआँ लगातार निकलता रहता था। दूसरे किनारे पर छोटे आकार की पहाड़ियों पर लोगों के घर थे। जहाज़ से देखने पर यह बिल्कुल किसी चित्रकार के लिये मुफ़ीद दृश्य जैसा दिखता था। हरा पहाड़, सफ़ेद घर, नीला आकाश, हल्की हरी नदी पर बहते सफेद याॅट ।
हम लांगव्यू पर रुक गए थे लेकिन कोलंबिया नदी यहाँ से आगे बहुत दूर तक जाती है। मेरे सामने वह थोड़ी दूर सीधी जाकर फिर पहाड़ियों के बीच में ओझल हो गयी थी। ये सप्ताहांत के दिन थे। जहाज़ के आस-पास और नदी में दूर-दूर तक ढेरों याॅट और छोटी-छोटी नावें दिख रही थीं। यहाँ के लोग अपनी छुट्टियाँ ऐसे ही बिताते हैं। नाव पर बैठकर मछली पकड़ते हुए। कुछ नावों पर तीन-चार लोग थे, वे कुछ परिवार रहे होंगे। कुछ नावों पर अकेला आदमी तो कुछ पर बूढ़े-बुढ़िया का जोड़ा। इनके घर यहीं पास में किनारों पर होंगे। ये सुबह उठकर नदी की सैर करने आए होंगे। पश्चिम के देशों में आराम का विशेष महत्व है। छुट्टी के दिनों में यहाँ कोई काम नहीं होता। शनिवार और इतवार को ऐसी जगहों में हवा में इत्मीनान पसर जाता है। इनकी कमाई इसके लिए पर्याप्त होती होगी कि ये दो दिन की छुट्टी के बाद भी विलासिता के साथ जी सकें। या यह भी मान सकते हैं कि जमा-जोड़ की इच्छाओं ने इनका पीछा वैसा नहीं किया जैसा अमूमन हमारे देश में होता है। हो यह भी सकता है कि लांगव्यू में रह रहे ये लोग यहाँ छुट्टियाँ मनाने ही आए हों और अभी अगले सप्ताह या महीने किसी दूसरे शहर में अपने काम पर चले जाएंगे। ख़ैर, यह सब ठहर कर और रह कर जानने वाली बातें हैं। सिर्फ़ एक-दो दिन के अवलोवन के आधार पर इतना कुछ कहना ठीक नहीं होगा। हालाँकि एक बात बताना चाहूँगा—बीच-बीच में जहाज़ में माल भरने की प्रक्रिया रोक दी जाती थी। बताया यह भी गया कि दिन के समय यहाँ माल नहीं भरा जा सकता। कारण पूछने पर पता लगा कि यहाँ किनारे पर रह रहे लोग कार्गो डस्ट उड़ने की शिकायत करते हैं। इसी प्रसंग में बातों-बातों में यह जानकारी भी हुई कि पश्चिम के कुछ बंदरगाहों पर न्वायज़ पल्यूशन और लाइट पल्यूशन की शिकायतों की वजह से भी कार्गो ऑपरेशन रोके जाते हैं। न्वायज़ वाली बात तो समझ में आई किन्तु लाइट पल्यूशन के बारे में लोगो की शिकायत यह होती है कि रात के वक़्त उन्हें बंदरगाहों की बत्तियों की वजह से नींद आने में तकलीफ़ होती है। यह सब सुनकर मन कहीं बीच की ऊहापोह में फंस जाता है। वह सोचता है कि जीवन को दी जा रही यह क़द्र सराहनीय है। फिर उसे लगता है लोग भी कैसी-कैसी शिकायतें करते हैं। और यह भी कि हमारे यहाँ मजबूर निर्धन लोग कैसी-कैसी कठिनाइयों में भी चैन से सो लेते हैं।
ख़ैर जाने दीजिए। बंदरगाह से सम्बन्धित एक व्यक्ति का नज़रिया देखिए- "पहले इस जगह पर कोई नहीं रहता था। फिर खेत वजूद में आए और फैक्ट्री लगी, उत्पादन होने लगा। इसके बाद बंदरगाह भी सक्रिय हुआ जिसकी वजह से रोज़गार के लिये लोगों ने यहाँ बसना शुरु किया। धीरे-धीरे जब जगह इतनी आबाद हो गई कि यहाँ घर-परिवार बसने लगे तो अब लोगों को उसी कार्गो डस्ट से दिक़्क़त हो रही है। ये शिकायतें इतनी ज़्यादा हो गई थीं कि प्रोडक्शन यूनिट को यहाँ से दूसरी जगह शिफ्ट किया गया। अब वहाँ से माल मालगाड़ी में भरकर यहाँ तक आता है।"
बहुत ग़ौर से देखने पर पता चलता है कि अन्दर से सब कुछ एक जैसा ही है। सबकी समस्याएँ और समाधान एक से हैं। अगर दूसरे तरीके से कहें तो शायद दुनिया के किसी भी हिस्से में रह रहे मानव की प्रतिक्रियाएँ एक समान ही हैं। हम कहते हैं कि भारत तरक्की करने के बाद अमेरिका जैसा न हो जाए। हालांकि पता नहीं इसको रोक पाना कितना संभव है क्योंकि शायद चीज़ों के आकार लेने की प्रक्रिया एक-सी होती है।
धीरे-धीरे प्राकृतिक सुषमा से पैदा हुए रूमानी एहसास ज़मीनी हक़ीक़त के बारे में जानने पर हल्के पड़ने लगते हैं। ऐसे में मैं फिर पहाड़ी की तरफ मुँह करता हूँ। पहाड़ी के शिखर धुंध और बादलों में ढके हुए हैं। आख़िरकार तीन-चार दिन तक माल भरने के बाद हम लांगव्यू से निकलकर एस्टोरिया के रास्ते अपने समुद्र में चले जाते हैं। अब यह माल कुछ दिनों की समुद्र की वीरान यात्रा के बाद दुनिया के किसी दूसरे कोने पर उतारा जायेगा। एक बार फिर ज़मीन, पेड़, घास और सड़क से ख़ाली दृश्य में दूर-दूर तक पानी के सिवा कुछ नहीं है। अगले कई दिनों तक यही समुद्र हमारे आस-पास, पसरा रहेगा। लेकिन इस बार मैं निराश नहीं हूँ। इस बार समुद्र की उदासी से निपटने के लिए मेरे पास कोलंबिया नदी और उसके तट की ये ख़ूबसूरत स्मृतियाँ हैं। समुद्र और जहाज़ तो रहेंगे ही…। जीवन रहा तो मैं इसी रास्ते से एक दिन फिर तुम्हारे पास लौटना चाहूँगा.... कोलम्बिया नदी।
योगेश ध्यानी एक कवि-लेखक और अनुवादक हैं। गोल चक्कर पर इनका पूर्व प्रकाशित काम देखिए : : फ़ोरुग फ़रुख़ज़ाद की कविता , नाओमी शिहाब नाए की कविताएँ, गिओकोंडा बेली की कविताएँ
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