रोजर डीन किसेर की कहानियाँ
- May 17
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Updated: May 27

रोजर डीन किसेर की कहानियाँ
अनुवाद : उपमा ऋचा
तितलियाँ
एक दौर था ज़िंदगी का जब खूबसूरती का मतलब बहुत ख़ास हुआ करता था मेरे लिए। उस वक़्त कोई छह या सात साल का था मैं, लेकिन अनाथालय में बिताए सैकड़ों हफ़्तों और महीनों ने मुझे बूढ़े आदमी में तब्दील कर दिया था।
अनाथालय में सवेरे जल्दी जाग जाता। किसी नन्हे सिपाही की तरह (जो कि मैं बन ही चुका था) अपने बिस्तर को तह करता और फिर दो सीधी पंक्तियों में से एक में खड़ा होकर नाश्ता लेने के लिए मार्च करता, उन बीस या तीस बच्चों के साथ जो मेरे बोर्डिंग हाउस में रहते थे।
वो शनिवार का दिन था। मैं नाश्ते के बाद अपने बोर्डिंग हाउस में लौट आया और देखा कि हमारी देखभाल के लिए रखा गया हाउस पेरेंट अनाथालय के चारों ओर फैली झाड़ियों में रहने वाली ख़ूबसूरत तितलियों को पकड़ रहा था। मैं गौर से देखता रहा। वह एक के बाद दूसरी तितली पकड़ता, उसे जाल में से निकालता और फिर उसके सिर और पंखों को सीधी पिनों के ज़रिए एक गत्ते पर टांक देता।
इतने सुंदर जीव को यूँ मार पाना कितनी क्रूरता भरी बात थी! मैं ख़ुद कई बार उन झाड़ियों के पास घूमता था। सोचता था कि वे कभी न कभी मेरे सिर पर, या हाथ पर या चेहरे पर आकर बैठ जाएंगी और मैं उनको बेहद क़रीब से देख सकूंगा।
एक दिन जैसे ही टेलीफोन की घण्टी घनघनाई, हाउस पेरेंट ने एक बड़े से गत्ते को सीमेंट की एक काली सीढ़ी पर फैला दिया और फिर फ़ोन का जवाब देने अंदर चला गया। मैं चुपचाप उस गत्ते के पास गया तो देखा उस पर एक तितली अटकाई जा चुकी है। तितली अब भी फड़फड़ाने की कोशिश कर रही थी। मैं उसके पास बैठ गया। उसके पंखों को छुआ और एक पिन गिरा दी। वो गोल-गोल घूमकर छूटने की कोशिश करने लगी, लेकिन उसका दूसरा पंख अभी भी पिन से अटका हुआ था। छूटने की जद्दोजहद में उसका पंख टूट गया। वो ज़मीन पर गिर गई और कांपने लगी।
मैंने पहले टूटा पंख उठाया और फिर तितली। धीरे से पंख को थपका और कोशिश की कि वो वापस चिपक जाए, ताकि तितली फिर से उड़ सके और हाउस पेरेंट के वापस आने से पहले आज़ाद हो जाए, पर वह चिपका ही नहीं।
अगले दिन जैसा कि मुझे मालूम था, हाउस पेरेंट पीछे की ओर कूड़ाघर के पास देखने आया और मुझे घूरने लगा। मैंने उससे कहा कि मैंने कुछ भी नहीं किया, पर वह माना ही नहीं। उसने गत्ता उठाकर मुझे सिर पर मारना शुरू कर दिया। हर तरह की तितलियों के टुकड़े हर ओर बिखरने लगे। फिर उसने गत्ते को ज़मीन पर फेंक दिया और मुझसे कहा, “उठा इसे और जाकर कूड़े में फेंक आ।” इतना कहकर वह चला गया।
मैं बड़े से पुराने पेड़ के क़रीब धूल में सना बैठा रहा। बड़ी देर तक जतन करता रहा कि तितलियों के टुकड़े जोड़ लूँ, ताकि उनको पूरा का पूरा दफ़ना सकूँ, लेकिन यह बहुत मुश्किल काम था। लिहाज़ा मैंने उनके लिए प्रार्थना की और एक टूटे हुए जूते के डिब्बे में उनको रख दिया। मैंने उनको उस क़िले की तहों में दफ़ना दिया जिसे मैंने ब्लेकबेरी की झाड़ियों के पास बांसों से बनाया था।
हर साल जब तितलियाँ अनाथालय की ओर लौटतीं, तो मैं कोशिश करता कि वे मेरे सिर पर आकर बैठ जाएँ और मैं उनको बहुत दूर उड़ा दूँ क्योंकि उन्हें नहीं मालूम था कि जीने और मरने के लिहाज़ से अनाथालय कितनी बुरी जगह होती है...।
एल्विस फ़्लोरिडा बार्बर कॉलेज के पास मरा था
दस बरस की उम्र में, मैं यह समझ नहीं पाता था कि एल्विस प्रिसले में ऐसा क्या था, जो हम बाक़ी लड़कों में नहीं! मेरा मतलब, उसके पास भी हम सबकी तरह एक सिर, दो हाथ और दो पैर थे। फिर उसमें ऐसा क्या छिपा था कि अनाथालय की तमाम हमउम्र लड़कियाँ उसकी उँगलियों पर नाचने को तयार रहती थीं! शनिवार की सुबह तक़रीबन नौ बजे मैंने वहाँ के एक बड़े लड़के इउगेने कोरेथेर्स से पूछने का फैसला लिया कि आख़िर वह कौन-सी बात थी जो एल्विस प्रिसले को ख़ास बनाती थी। उसने मुझे बताया कि दरअसल इसकी दो वजहें थीं— एक एल्विस के घुंघराले बाल और दूसरी उसकी मस्तानी चाल…।
लगभग आधे घंटे बाद अनाथालय के सब लड़कों को एक जगह बुलाया गया और उनसे कहा गया कि हम सब फ्लोरिडा के क़स्बे जेकस्नोविल जा रहे हैं, जहाँ हमें मिलेंगे- नए चमचमाते जूते और एक नया हेयरकट। यह सुनते ही मेरे भीतर एक ख़्याल कई टन वजनी पत्थर की तरह टकराया- “अगर एल्विस का हेयरकट ही उसकी ख़ासियत है तो मैं भी आज वही हेयरकट करवाऊंगा।”
रास्ते भर मैं इसी बारे में बात करता रहा। मैंने सबको बता दिया था। यहाँ तक कि जो मेट्रन हमें अनाथालय से क़स्बे तक ले जा रही थीं, उन्हें भी मैंने बताया कि जल्द ही मैं एल्विस प्रिसले जैसा दिखने जा रहा हूँ; कि मैं भी उसकी तरह घूमना सीख जाऊँगा; कि मैं भी एक दिन उसके जैसा अमीर और मशहूर बन जाऊँगा।
जब मुझे नए जूते मिले, मैं मुस्कुरा पड़ा और मेरी मुस्कान ऐसी थी कि मेरे कानों तक पहुँच गई और वे वे भी मुस्कुराने लगे। मैं स्टोर हाउस के चक्कर लगाते हुए हर किसी को अपने जूतों की चमक दिखाने की कोशिश करने लगा। वे सचमुच बहुत अच्छे थे और ख़ूब चमचमा रहे थे। लेकिन मुझे सबसे अच्छा लग रहा था स्टोर हाउस की एक्स-रे मशीन में अपने पैरों की हड्डियाँ देखना- “ओह वे कितनी हरी नज़र आ रही थीं।” अब मैं अपने नए हेयरकट का और ज़्यादा इंतज़ार नहीं कर सकता था। चूँकि अब मुझे नए जूते मिल गए थे, मुझे जल्दी अनाथालय लौटकर एल्विस की तरह चलने का अभ्यास भी करना था।
आख़िरकार हम उस दुकान पर पहुँचे, जहाँ हमारे बाल मुफ़्त में कटने वाले थे क्योंकि हम अनाथ थे। ख़ैर, मैं दौड़कर एक बाल काटने वाले के पास गया और उछलने लगा ताकि वह मुझे उठाकर ऊँची कुर्सी पर बिठा दे। मैंने उस आदमी को देखा और अपने चेहरे पर एक बड़ी-सी मुस्कान चस्पा करते हुए उससे पूछा,
“मुझे एल्विस प्रिसले जैसा हेयर-कट चाहिए। क्या तुम मेरे बलों को एल्विस जैसा बना सकते हो?”
“नन्हे दोस्त, देखते हैं कि मैं क्या कर सकता हूँ,” उसने कहा।
जैसे ही उसने मेरे बाल काटने शुरू किए, मेरी ख़ुशी की सीमा न रही। लेकिन तभी मेट्रन ने उसे अपने पास आने का इशारा किया। फिर वह उसके कान में कुछ फुसफुसाईं। उसने सिर हिलाया मानो उन्हें किसी काम के लिए 'न' कह रहा हो। वह ऑफिस में बैठे एक दूसरे आदमी के पास गईं और उससे कुछ कहने लगीं। तब वह ठिगना आदमी झूमता-सा आया और उस आदमी से कुछ कहने लगा, जिसे मेरे बाल काटने थे। इसके बाद जो अगली बात मुझे मालूम हुई, वह यह थी कि उन्हें हम लोगों को एल्विस हेयर-कट देने की इज़ाजत नहीं है। फिर मैंने उसे कंघा उठाते देखा और फिर अपने बालों को ज़मीन पर गिरते...।
कुछ ही देर में मेरे सिर पर से बाल पूरी तरह ग़ायब हो चुके थे। अपना काम ख़त्म करने के बाद उसने मुझे पाउडर की खुशबुओं से तर कर दिया और मेरे हाथ में ताँबे का एक सिक्का रखते हुए बोला,
“अपने लिए बाहर दुकान से कैंडी ले लेना।”
मैंने उसका सिक्का उसे वापस थमा दिया और कह दिया, “मैं भूखा नहीं हूँ।”
“ओह बच्चे, मुझे माफ़ कर दो।” मुझे कुर्सी से उतारते हुए वह बोला।
“मैं कोई बच्चा नहीं हूँ।” आँखों से बहते आंसुओं को पोंछते हुए मैंने जवाब दिया।
मैं ज़मीन पर बैठ गया और अपने जूतों पर से बाल झाड़ने लगा ताकि वे नए और चमकीले नज़र आते रह सकें। फिर मैं उठा, पैंट झाड़ी और दरवाज़े की ओर बढ़ गया। मेट्रन मुझे देखकर हँसने लगीं, मानो मैं कोई जोकर हूँ। जिस आदमी ने मेरे बाल काटे थे, वह चिल्लाया-
“त...तुम चुड़ैल हो।”
वह पलटकर उससे भी ज़्यादा ज़ोर से चिल्लाई और गुस्से से पैर फटकारती हुई तेज़ी में ऑफिस की ओर चली गईं। मेरे बाल काटने वाले ने बेबसी से दीवार पर मुक्का मारा और धीरे-धीरे चलता हुआ बाहर आ गया जहाँ मैं खड़ा था। उसने मुझे देखा, मुस्कुराया और मेरा गंजा सिर सहला दिया। मैंने आंसुओं से तरबतर आँखों से उसे देखा और पूछा-
“क्या तुम्हें मालूम है कि एल्विस प्रिसले की हड्डियाँ हरी दिखती हैं या नहीं?”
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रोजर डीन किसेर कैलिफोर्निया में 20 नवंबर 1945 को जन्मे एक अमेरिकी लेखक हैं। वह अपनी सच्ची कहानियों के लिए मशहूर हैं। वह अनाथालय और बचपन के शोषण पर लिखते हैं। चार साल की उम्र में रोजर डीन किसेर को छोड़ दिया गया। पहले पेरेंट्स ने और फिर ग्रांडपेरेंट्स ने। यह बच्चा फ्लोरिडा के एक अनाथालय में पला। अनाथालय के क्रूरतापूर्ण और गाली-गलौज भरे वातावरण को बर्दाश्त कर पाने में असमर्थ रहा तो कई बार भागने की कोशिश की, आख़िरकार उसे फ्लोरिडा के एक रिफाॅर्म स्कूल में भेज दिया गया। उस वक़्त रोजर बारह बरस का था। अपनों द्वारा छोड़ा जाना, अनाथालय में बुरा बर्ताव झेलना, बार-बार भागना पर पकड़े जाना और फिर बिगड़े बच्चे का ख़िताब लेकर रिफाॅर्म स्कूल के कठोर क़ायदों में बँध जाना...। ये तमाम कड़वे अनुभव उस बच्चे के भीतर एक लेखक को आकार देते रहे जिन्हें बाद में उसने अपनी कहानियों और किताब के पन्नों में दर्ज किया...। रोजर डीन किसेर की पहली किताब का नाम था- ओर्फ़ेनेज’। यहाँ प्रस्तुत दोनों कहानियाँ उनके अनुभव की टीस को पाठक के मन में गहरे उतार देती हैं।
उपमा ऋचा पिछले डेढ़ दशक से लेखन, संपादन व अनुवाद कार्य में सक्रिय हैं। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : उपमा ऋचा
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इन कहानियों को पढ़कर जी भर आया. बेहद मार्मिक. उस अमेरिकी लेखक को क्या मालूम कि उपमा ऋचा एक दिन उनकी कहानियों का अनुवाद करेंगी.साहित्य इसीलिए शाश्वत है. गोलचक्कर प्रिय होता जा रहा है.
दोनों कहानियां मर्म को छूने वाली। मैंने इस लेखक को पहली बार पढ़ा, और पढ़ने की उत्सुकता बढ़ गई। बस एक बात खटकी - कानों तक मुस्कुराना।
गोल चक्कर को एक बार फिर से बधाई निरंतर अच्छी सामग्री उपलब्ध कराते रहने के लिए।
यादवेन्द्र