top of page

ध्यान सिंह की कविताएँ

  • Mar 11
  • 3 min read


ध्यान सिंह की कविताएँ
मूल डोगरी से अनुवाद : कमल जीत चौधरी


फेरी वालियां 


शहद बेचने वालीं

मीठा सुर लगाती आईं, तो 

मैंने शहद ख़रीद लिया

जब चखा, तो उसे कुछ कड़वा पाया


दूध बेचने वालीं

अलख जगाती आईं, तो 

मैंने दूध खरीद लिया

जब उसमें पोर डुबोया, तो उसे पानी ही पाया


फिर एक रसभरी आवाज़ सुनाई दी :

'नींबू ले लो, मीठे नींबू ले लो'

वह भी मुझे लेने ही पड़े

मगर बाद में जाना, कि उनमें रस ही नहीं था


शाल-कम्बल बेचने वाली आई, तो

उस पर तरस खाते हुए

एक शाल भी लेना पड़ा

रात को उसे ओढ़ा

तो जाना कि उसकी बुक्कल में 

निग्घापन ही नहीं है...


इन बेचने वाली औरतों से सिर्फ़

यह पूछने का मन हुआ 

कि इनका व्यापार झूठा-खोटा क्यों है


आख़िर एक दिन; 

एक ने अचानक मुलाक़ात में 

यह समझाया कि 

सारे ख़रीदार मर्द ही थे

लालसा के मारे बूढ़े-बेचारे।



दिमाग़ और अखरोट 


बाहर और अन्दर से 

दोनों 

एक जैसे लगते हैं

दिमाग़ लगाने के, और

अखरोट खाने के काम आता है

...

अखरोट लगाने से

कुछ नुकसान नहीं होता है, और

दिमाग़ खाने से

सब चट-फट जाता है।



सौंदर्यबोध


पेड़ जब स्नान करते हैं 

तो सुन्दर लगते हैं

उनसे भी अधिक सुन्दर 

उनके पत्ते लगते हैं

पत्तों से भी अधिक सुन्दर 

उनके फूल लगते हैं

अपनी खुशबू और रंगों की कसौटी से

जो सभी को भाते हैं

मन छूते हैं


वैसे सबसे ज़्यादा सुन्दर पक्षी लगते हैं

जो कूकते-गाते हैं

मानव को उसकी पहचान कराते 

उसे देखने-सुनने का भाव समझाते


मेरे लिए यह धरती ही बहुत सुन्दर है

जिसकी शरण में हम पलते हैं

मेरा यही सौंदर्यबोध है।



घर


भंडारनों* का घर मिट्टी के दुग्गे* में होता है

रेशम का घर ककून में

पक्षियों का घोंसलों में

गरुड़ का तारों के जाल में

मच्छ और मछलियों का पानी में

मानव के घर की कल्पना निश्चित नहीं है

आजकल वह अंतरिक्ष में ज़मीन ढूँढ़ रहा है।



*भंडारन- मड डाउबर (दीवार के कोनों में मिट्टी के घर बनाने वाली ततैया)

दुग्गा- मिट्टी का सख़्त छोटा-सा गोला 



रास्ता 


बेटा, उन्होंने डयोढ़ी दूसरी ओर बनवा ली है।

चाचू, तो इससे रास्ता बंद हो गया?

बेटा, रास्ता तब तक रहता है 

जब तक उस पर कोई चलता रहता है।

चाचू, रास्ता तो नहीं रुकता 

न ही ख़त्म होता है

रस्ते का करस्ता* नहीं बन सकता ?

वाह! बेटा, कुलांचे भरो।


*करस्ता- रास्ता बंद होने पर, वहीं से कोई दूसरी पगडंडी बना लेना



प्रतीक्षारत लड़की और रास्ता 


मैंने प्रतीक्षारत बैठी

एक लड़की से पूछा :

यह रास्ता कहाँ जाता है?

उसने हँसते हुए उत्तर दिया :

यह वहाँ जाता है, जहाँ जाना बनता है।


मैंने कहा :

यह न बैठता है

न खड़ा होता है

बिना विश्राम किए

बस चलता रहता है।


कुछ सोचकर वह उठी

यह कहते हुए :

इसकी कोई मंज़िल नहीं

यह भूले-बिसरे पथिकों की 

प्रतीक्षा करता हुआ

बस चलता रहता है...।



आलोचक 


मैं गुलशन नहीं हूँ।

यह तस्दीक़ तो 

मेरा आलोचक ही कर सकता है।

आलोचक :

जो पतझड़ की प्रतीक्षा कर रहा है।



गोल चक्कर वेब पत्रिका अत्यंत सीमित संसाधनों से चल रही है। इस वेबसाइट के संचालन में आर्थिक सहयोग देने हेतु दिए गए क्यू आर कोड का उपयोग करें :




ध्यान सिंह का जन्म 2 मार्च, 1939 ई को जम्मू के घरोटा नामक गाँव में हुआ। वे डोगरी के वरिष्ठ कवि-कथाकार-नाटककार व अनुवादक हैं। विभिन्न विधाओं में इनकी लगभग 75 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके लेखन में मार्क्सवादी चेतना दिखती है। लेखन में ही नहीं; बल्कि इनके व्यवहार में भी वैचारिक प्रतिबद्धता देखी जा सकती है। वे श्रमिक संघ के कार्यकर्ता हैं। अपने गाँव में रहते हुए; वे आज भी सक्रिय हैं। लोक संस्कृति और ग्रामीण खेलों के संरक्षण हेतु पर्याप्त कार्य करते हैं। इन्हें 'परछावें दी लो' (2009) शीर्षक कविता संग्रह पर 'साहित्य अकादेमी' पुरस्कार मिला है। इसके अलावा वे 'बाल साहित्य' (2014) पुरस्कार,  'दीनू भाई पंत सम्मान' (2022) और जम्मू-कश्मीर स्टेट अवॉर्ड (2023) से भी सम्मानित हैं। सम्पर्क:‌ गाँव व डाक- बटैहड़ा, तहसील व ज़िला- जम्मू, पिन कोड- 181206, जम्मू-कश्मीर, फ़ोन- 9419259879


कमल जीत चौधरी हिन्दी के सुपरिचित कवि-लेखक व अनुवादक हैं। इनके दो कविता संग्रह 'हिन्दी का नमक' (2016) और 'दुनिया का अंतिम घोषणापत्र' (2023) प्रकाशित हैं। इन्होंने जम्मू-कश्मीर की कविताई को रेखांकित करते हुए ‘मुझे आई डी कार्ड दिलाओ' (2018) नामक एक कविता संग्रह संपादित किया है। ‘समकाल की आवाज़’ शीर्षक से इनका एक चयन भी छपा है। इनकी कविताएँ विभिन्न भारतीय भाषाओं और अंग्रेज़ी में अनूदित व प्रकाशित हुई हैं। इन्होंने अनेक डोगरी कविताओं का हिन्दी अनुवाद भी किया है। इन दिनों 'परांस' नामक मासिक स्तम्भ में जम्मू-कश्मीर की कविताई पर लिख रहे हैं। गोल चक्कर पर इनका पूर्व प्रकाशित काम देखिए : मोहन सिंह की कविताएँ। सम्पर्क : jottra13@gmail.com





2 Comments


Yadvendra
7 days ago

फेरी वालियाँ बहुत अच्छी कविता है। बाकी कविताओं में भी एक ठेठ किस्म की ताज़गी है।

कवि और अनुवादक को बधाई।

यादवेन्द्र

Like

Khushboo sharma
Mar 11

फेरी वालिया और आलोचक कविताएं मुझे बहुत पसंद आई! 👏

Like
bottom of page