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हाइकु : क्षण भर में रोमांच का अनुभव
इस जटिल, आपाधापी की दुनिया में जब लंबी, खाली शामें हमें मुहैया नहीं हैं, तब हाइकु के माध्यम से क्षण में रोमांच खोजना हम सीख सकते हैं। इनमें प्रयुक्त बिम्ब, उनकी क्षणिकता हमें हमारे चारों ओर फैले साधारण दृश्यों को सराहने, कभी उनसे आश्चर्यचकित होने, कभी उनसे उपजी ऊब से परहेज़ न करने, कभी किसी कठोर दिन में सहज बने रहने के लिए प्रेरित कर सकते हैं


मिर्ज़ा ग़ालिब : आशिक़ या शायर
है बस कि हर इक उनके इशारे में निशा और
करते हैं मुहब्बत तो गुज़रता है गुमां और


रुत बरसन की आई (बारिशें और रेगिस्तान)
जब बरसने लगता है गरज-गरज कर तो बुढ़िया माई के चेहरे पर उतर आती है दंतविहीन मुस्कान। वह चारपाई पर बैठे-बैठे उसी मुस्कान संग देखती रहती है बच्चों के पानी के साथ छपाक-छप के करतब।


गैब्रियल मात्ज़नेफ़ : साहित्य का अपराध और वनेसा स्प्रिंगोरा का प्रतिरोध
प्रश्न यह है कि जब कोई लेखक खुले तौर पर बच्चों के साथ यौन संबंधों को महिमा के साथ प्रस्तुत करता है — और जब समाज उसे पुरस्कार, पेंशन और मंच देता है — तो क्या वह केवल लेखक रह जाता है? या फिर वह एक अपराधी बनकर भी समाज के विवेक की परीक्षा लेता है?


भूकंप-कथा (जो बचा रह गया)
घर के बीज तो हम ख़ुद में छिपाये फिरते हैं इसीलिए सैकड़ों बार उजड़ने के बाद दोबारा स्थापित हो जाते हैं।


ली मिन-युंग का काव्य-संसार
यदि अनुवाद की सुविधा न होती तो संसार कितना निर्धन लगता! वह अनुवाद ही है जिसने भूमण्डलीकृत विश्व ग्राम के समानांतर एक सांस्कृतिक विश्वग्राम की रचना की है। भाषा और साहित्य का एक वैश्विक परिवार निर्मित किया है।


काश ऐसे ही फूल हमारी ज़िंदगियों में भी खिल पाएं
बड़ा फूल कह रहा है, बच्चा फूल सुन रहा है : “कल मैं मुरझाकर मर जाऊंगा तब तुम महकाना इस बगिया को!”


हिन्दी साहित्य में विकलांग विमर्श
समाज में और स्वयं में विमर्श की भाषा का विकास करना होगा तभी हम सही मायने में विकलांग-विमर्श में सक्षम हो पाएंगे।


देवभूमि बनाम भूतभूमि
वक़्त बीतने के साथ उत्तराखंड के गाँवों से लोग पलायन करने लगे। गाँव ख़ाली होते गए और अब गाँवों में देवता ज़्यादा और लोग कम रह गए हैं।


शब्द शरीर
जीवन भर मृत्यु चाहने वालों के पास जब मृत्यु पहुँचती है तो वो भागते फिरते हैं। भागने वालों के लिए कोई भी दुनिया सुकून भरी नहीं हो सकती।
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