बाबूजी की साइकिल (संस्मरण)
- May 9
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Updated: Jun 20

बाबूजी की साइकिल (संस्मरण)
ललन चतुर्वेदी
गरीब के घर में छोटी सी खुशी भी लम्बी तपस्या के बाद आती है। इसके लिए उसे जी-तोड़ परिश्रम करना पड़ता है। कभी झूठ बोलना पड़ता है। कभी उधार-पंइचा लेना पड़ता है। कितनी जिल्लतें झेलनी पड़ती हैं! बड़ी आसानी से लोग गरीबों को बेईमान कह देते हैं जबकि इसी समाज में करोड़ों का घोटाला करने वाले सम्मान के पात्र बने हुए हैं। भारतीय समाज की यह दुखद तस्वीर है। मैं यहाँ बेईमानी का औचित्य निरूपण नहीं कर रहा हूँ। एक दर्द है जो छलक जाता है। इसके छीटें पड़ जाने से सभ्य लोग नाराज हो जाते हैं तो मैं क्या करूँ?
बाबूजी के जीवन में पहली साइकिल कैसे आयी, यह तो पता नहीं लेकिन जो उन्होंने सुनाया उस किस्से को सुना रहा हूँ। वह कक्षा सात के विद्यार्थी थे, जब उन्होंने कैंचिया साइकिल चलाना सीखा। इस दौरान वे बीमार पड़े और खून की उल्टियाँ आनी शुरू हो गयीं। बीमारी और गरीबी यूँ कहिये कि भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गयी। पढ़ाई छूटी। फिर जीवन के गोरखधंधे में डूब गए। वह साइकिल कहाँ से मिली इसकी ठोस जानकारी मेरे पास उपलब्ध नहीं है। यह उनकी अपनी साइकिल थी या किसी से मांगकर इसका उपयोग करते थे,निश्चित तौर पर मैं कह नहीं सकता।
पचास-साठ के दशक में ग्रामीण क्षेत्रों में बैलगाड़ी और साइकिल ही यातायात के साधन थे। ये दोनों ही साधन सबके पास उपलब्ध नहीं थे। अधिकांश लोग पैदल लम्बी दूरियां तय करते थे। आठ-दस किलोमीटर तक बच्चे स्कूल और वयस्क पैदल ही बाजार जाते थे। बाजार भी पांच-छ: किलोमीटर पर लगते थे। शहरीकरण का दौर नहीं था। आज कोई भले ही साइकिल को भाव न दे लेकिन साइकिल से हमारे समाज में अभूतपूर्व क्रांति आयी है। यह अलग से विचारणीय विषय है। जिन दिनों सबके पास साइकिल नहीं हुआ करती थी, लोग एक-दूसरे से मांग कर अपना काम किया करते थे, सगे-सम्बन्धियों के यहाँ जाया करते थे। अपने विद्यार्थी जीवन में मैंने भी अनेक बार दूसरों की साइकिल का उपयोग किया है। यह दूसरी बात है कि मेरे बदले बाबूजी दूसरे से साइकिल मांग कर मुझे उपलब्ध कराया करते थे। किसी से कुछ मांगने में स्वाभिमान आड़े आता था। एक पिता अपने बच्चों के लिए तरह-तरह तक के समझौते करता है। यह सब पिता बनने के बाद महसूस होता है। इस क्रम में कई बार अपमानजनक स्थितियों से भी गुजरना पड़ा। यह एक अंतहीन यातनापूर्ण कहानी है।
बाबूजी के कथनानुसार जब उनका विवाह हुआ, तब भी उनके पास साइकिल नहीं थी। उन दिनों समृद्ध व्यक्ति को ही दहेज़ में साइकिल मिला करती थी। बाबूजी को कैसे मिलती? खैर, अधिकृत रूप से उन्हें पहली साइकिल ससुराल के गाँव से ही मिली। यह भी एक दिलचस्प किस्सा है। उनकी यह सेकंड हैंड साइकिल मेरे इस दुनिया में आने के चार साल पहले वर्ष उन्नीस सौ बासठ में आई थी। पहले शादी-विवाह में नाच पार्टी का सट्टा बंधवाया जाता था। उसमें पुरुष ही नाचा करते थे। उन्हें लौंडा कहा जाता था। पार्टी में जोकर भी होता था। शादी की रात में जब वर विवाह के लिए मंडप चला जाता तो बारातियों के मनोरंजन के लिए रात भर नाच होता था। शादी के दूसरे दिन भी बाराती कन्या पक्ष के गाँव में ही रहते थे। इस दिन को मरजाद (मर्यादा से निर्मित शब्द) कहा जाता था। उस दिन भी शाम तक नाच होता था। धनवान लोग तो वेश्याओं का नाच देखते थे। गरीब लोगों की इतनी सामर्थ्य नहीं होती थी कि वे बेटे के ब्याह में नाच ले जा सके (मैं पुरानी परम्परा की बात कर रहा हूँ, इसमें कहीं से भी मेरा समर्थन का भाव नहीं है)। यह दूसरी बात है कि बेटे के ब्याह की खुशियाँ अपरिमित होती हैं। अकेले इतनी खुशी संभाली नहीं जा सकती इसीलिए बारात की परंपरा शुरू हुई होगी। संभवतः खुशियों के विभाजन का यह शानदार तरीका है क्योंकि कोई भी बाराती वर-यात्रा के दौरान खाने-पीने और आनंद लूटने-लुटाने के अतिरिक्त कुछ भी सोच नहीं सकता। यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि हम सब जीवन में एक बार दूल्हा बनते है (कभी-कभी दुर्भाग्य से एकाधिक बार भी) और सैकड़ों बार बाराती। इस खुशी की अनुभूति जिसे हुई है, वह इन विचारों से असहमत नहीं होगा। अब नाच के तथाकथित सभ्य संस्करण प्रचलन में हैं जिनके बारे में यहाँ कुछ कहना आवश्यक नहीं है।
मेरे ननिहाल में रुदल राय नाच पार्टी चलाते थे। थोड़े दबंग किस्म के व्यक्ति थे। पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन पॉकेट में डायरी और कलम अवश्य रखते थे। न जाने कब नाच का सट्टा बांधना पड़ जाये। उसे डायरी में नोट करना जरूरी होता था। देव-संयोगवश वे बाबूजी के मित्र बन गए। उनके जमीन-जायदाद संबंधी कुछ मामले थे। बाबूजी कागज़-पत्तर के मामले में होशियार थे। नौवीं पास होने के बावजूद उनकी अंग्रेजी अच्छी थी। उनकी आवाज जानदार थी। उन दिनों आकाशवाणी पटना से अनंत कुमार समाचार वाचन करते थे। उनकी आवाज का जादू पूरे बिहार पर था। हमारे गाँव के भक्त कीर्तनिया बनारस सिंह कहा करते थे कि बच्चा बाबू और अनंत कुमार की आवाज एक सी है (मेरे बाबूजी का पुकारु नाम बच्चा बाबू था)। कोई भी व्यक्ति उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। बहरहाल, उस नाच पार्टी में बसकितवा नाम का एक पुरुष नर्तक था। उसके दुनिया में नहीं रहने पर रुदल राय ने उसकी पुरानी रेले साइकिल उचित मूल्य पर पिताजी को बेच दी। उन दिनों साइकिल में डायनमो लगाने का चलन था। साइकिलें सुन्दर और मजबूत भी हुआ करती थीं। कुछ लोग साइकिल को दुल्हन की तरह सजा कर रखते थे जबकि कुछ लोग जो सादगी पसंद थे, उनकी साइकिलें जीवनपर्यंत बेस मॉडल में ही रहा करती थीं। मैंने ऐसी साइकिलें भी देखी है जिनमें आगे डोलची और पीछे कैरियर में डिक्की लगे होते हैं। बिहार के लोग तो जुगाड़ू हैं और चीजों को अपनी सुविधानुसार मोल्ड कर लेते हैं। हाल-फिलहाल बेंगलूर जैसे महानगर में मैंने एक अद्भुत साइकिल प्रेमी को देखा जिसके साइकिल में टेप रिकार्डर लगा था। वह जब भी निकलता पुराने फ़िल्मी गीतों से मोहल्ला गुलजार करता चलता था। संसार में सौ किस्म के लोग हैं और सबकी अपनी रुचियाँ हैं। जो भी हो, नचनिया की साइकिलों में डायनमो लगाने की ख़ास वजह होती थी। वे रात-बिरात दूर-दूर तक नाचने के लिए जाते थे। अंधेरी रात में कच्ची और ऊँची-नीची सड़कों से उन्हें गुजरना होता था। ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में डायनमो उनका पथ-प्रदर्शक हुआ करता था। क्षण भर विचारें कि मीलों साइकिल चलाकर महफ़िल में रात भर नाच-गा कर लोगों का मनोरंजन करना कितना दुष्कर काम होता होगा! उनकी याद में यही कह सकता हूँ- “दिल रोया कि आँख भर आई, किसी से अब क्या कहना।” इसलिए बसकितवा को मैं यहाँ श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए आगे बढ़ना चाहता हूँ। लोग कहते थे कि उसकी कमर में गजब की लोच थी। जब वह साड़ी बाँध कर स्टेज पर उतरता था लोग आँखें फाड़ कर देखते थे। यहाँ तक कि संभ्रांत घर की महिलाएं भी खिड़की से घूंघट काढ़ कर रात-रात भर उसका नाच देखतीं थी। रात भर नाचते-नाचते और बीड़ी पीने से वह टीबी ग्रस्त हो गया और इस दुनिया से विदा हो गया।
प्रसंगवश, यह भी बतला दूं कि इन पुरुष नर्तकों की पीड़ा महसूस करने योग्य है। रात भर नाचने के बाद सुबह इनका चेहरा निस्तेज और काला पड़ जाता है। समाज में इन्हें अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता है। इस समय मुझे बुद्ध याद आ रहे हैं। उनके मन में अचानक दुःख और करुणा का प्रवेश नहीं हुआ होगा। सुख के शीशमहल में आखिर दुःख किस द्वार से प्रवेश कर गया। केवल शव यात्रा और वृद्ध को देख कर नहीं अपितु नृत्य के बाद बेसुध और निस्तेज नर्तकियों को देखकर उनके मन में विरक्ति जागी और दृढ़ हुई होगी। तभी वे समष्टि की मुक्ति के लिए सुख के समस्त साधनों को त्याग कर निकल पड़े होंगे।
यह तो बतला ही चुका हूँ कि बाबूजी की वह पहली साइकिल सेकंड हैंड थी और समय के साथ पुरानी होने लगी। लेकिन उसकी गजब की चाल थी। मैं तो उसे चालबाज साइकिल कहूँगा। मालूम नहीं चालबाज का अर्थ कैसे धोखेबाज हो गया है। वह अपनी साइकिल किसी को देते नहीं थे परन्तु जब कोई उस पर सवारी करता उसका मुरीद हो जाता। उसके मुंह से सहसा यह वाक्य निकल पड़ता- “यह पानी की तरह चलती है।” दुनिया में बनी विभिन्न किस्मों की साइकिलों की सवारी मैंने नहीं की है लेकिन अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि रेले साइकिल की चाल का कोई जवाब नहीं था। बहुत पहले यह कंपनी बंद हो गयी। खैर, साइकिल बीच-बीच में ख़राब होती रही और उसके पार्ट-पुर्जों में टूट-फूट होती रही। साथ-साथ मरम्मत भी होती रही। इन सब का मैं चश्मदीद गवाह रहा हूँ। जब कभी टायर पुराना हो जाता, हवा अधिक होने से फट जाता। हमारे यहाँ कहते हैं कि ‘साइकिल आवाज हो गया।’ शब्दों के लिंग पर वहां कौन ध्यान देता है। अपने प्रदेश के लोग बड़े प्यारे हैं। जब पुल्लिंग को स्त्रीलिंग बनाते हैं तो आनंद आ जाता है। खैर, एक-दो बार टायर फटे तो सिलाई कराकर मरम्मत करा लेते थे। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता था कि मोची के पास सिलाई का कोई स्कोप नहीं होता था, तब वह पुरानी टायर से छोटा सा हिस्सा काटकर इस टायर में जोड़कर सिलाई कर देता था। कुछ मौके पर बाबूजी सेकंड हैंड टायर भी आधे या चौथाई दाम में चढ़वा लेते थे। ट्यूब तो पंक्चर से तार-तार हो जाता था। ट्यूब को भी बीच से काटकर पुनः जुड़वा कर कुछ महीने तक उन्हें काम चलाते हुए देखा है। ‘साइकिल का जनतंत्र’ पुस्तक में प्रकाशित कविता-पुरानी चीजों की याद में इसका संकेत है। रेले साइकिल का अगला फ्राक (फोर्क) थोड़ा नाजुक हुआ करता था (हमारे यहाँ मुख-सुविधा के लिए इसे फ्राक कहते हैं)। पुराना होने पर जर्किंग में जब अगला चक्का पड़ता था, वह अक्सर टूट जाता था। बाबूजी की साइकिल के अगले फ्राक के दोनों हिस्से बारी-बारी से टूटे। उन्होंने बाजाप्ता वेल्डिंग कराकर उसे वर्षों चलाया। कालांतर में हैंडल से जुड़ने वाला उसका पाइप भी टूटा। हर चीज की एक उम्र होती है। यह बाबूजी का साइकिल प्रेम था या कुछ और, आप समझ सकते हैं। आज के ‘यूज एंड थ्रो’ समय के बच्चों को इसकी परख कैसे होगी? अच्छा है कि वे एक संपन्न दुनिया के नागरिक हैं। खैर, अब फ्रेम टूटने की बारी थी। पहले नीचे के हिस्से का टूटा। वेल्डिंग हुई। कुछ वर्षों के बाद ऊपर वाला भी टूटा। वही ऊपरी फ्रेम जिस पर बाबूजी मोटा गमछा बाँध कर मुझे बैठाकर कहीं-कहीं ले जाते थे। अभाव के बावजूद, जोतिक लाल की दुकान में गुलाब जामुन अवश्य खिलाते थे। पिता के अभाव में भी भाव होता है। प्रेमी अपनी प्रेमिका के लिए आकाश के तारे भले ही तोड़ न लाये लेकिन एक पिता अपनी संतान के लिए आकाश में सुराख करने का हौसला रखता है।
जब साइकिल खराब हो जाती तो कई-कई दिनों तक यूँ ही दीवार के सहारे टिक कर खड़ी रहती। जैसे वह घर के वृद्ध मरीज की तरह बाट जोह रही हो कि मेरा इलाज कराओ। बाबूजी एक नजर देखते और दूसरे-दूसरे कामों में लग जाते। कहीं जाना होता तो पैदल ही जाते। जब पैसे की व्यवस्था होती तो बनवा लाते। कभी शंकर मिस्त्री से उधार ही बनवा लेते। मैंने देखा है कि शंकर मिस्त्री उधारी के पैसे के लिए दरवाजे पर अहले सुबह पहुँच जाते और उसके बदले अनाज लेकर चले जाते। खैर, जिस दिन बाबूजी साइकिल बनवा कर लौटते थे, वह दिन मेरे लिए खासा आनंद का होता था। मैं साइकिल को उसी तरह निहारता था, जिस तरह कोई युवक पहली बार अपनी प्रेयसी या पत्नी को देख रहा होता है। सर्विसिंग के बाद साइकिल थोड़ी तरोताजा लगती जैसे किसी दुल्हन ने शृंगार कर लिया हो। नए टायर उसके वस्त्र, सीट कवर उसके मुकुट और हब में लगे रंगीन केशिया जूड़े के फूल की तरह लगते थे। भले ही साइकिल पुरानी थी लेकिन मैं चाहता था कि वह मेंटेन रहे। मैं चाहता था कि उसके हब में हमेशा रंगीन फूल रहे। एकाध बार मैंने दूसरे की साइकिल से केशिया निकाल कर (चुरा कर कहना सही होगा) अपनी साइकिल में फूल लगा लिये थे। हीरा और खीरा की चोरी में कोई फर्क नहीं है—चोरी, चोरी है। बाबूजी अपनी साइकिल को लेकर बहुत पजेसिव थे। इसके कारण भी थे। वही उनका हाथ-पैर था।
जीवन में छोटी-छोटी निर्जीव चीजें हमें बहुत सहायता पहुंचाती हैं। इन निर्जीव चीजों में जीवंतता है क्योंकि ये हमारे जीवन को आसान बनाती हैं। हमें अवकाश कहाँ है कि इन चीजों के बारे में संवेदनशील होकर सोचें। मैं इन्हें याद कर भावुक हो उठता हूँ। बाबूजी की साइकिल का उपयोग मैं भी किया करता था। घर में एक ही साइकिल थी। जिस दिन मैं स्कूल लेकर चल जाता था, वे दिन भर कहीं नहीं जा सकते थे। मेरा स्कूल पांच किलोमीटर दूर था। मैं पैदल ही जाता था। कभी-कभार ही साइकिल लिया करता था। समस्या तब उत्पन्न हो गयी जब ग्रेजुएशन में घर से बीस किलोमीटर दूर एडमिशन हो गया। बाबूजी जिस दिन गुस्सा होते, साइकिल नहीं देते थे। हाथ से साइकिल छीनकर रख देते थे। मैं असहाय होकर हँसता रहता था। पिता की डांट सौभाग्यशालियों को मिलती है। समस्या यह थी कि मेरी शादी हो गयी। ससुराल वाले ने इस बेरोजगार आदमी को कलाई घड़ी और पांच बैटरी का फिलिप्स ट्रांजिस्टर तो बिना माँगे दे दिया लेकिन साइकिल देने की सद्बुद्धि नहीं आयी। मैं दहेज़ का आकांक्षी नहीं, विरोधी हूँ। उस समय बाल बुद्धि थी और मैं वयस्क भी नहीं था। अठारह से कम उम्र थी। मताधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता था। वर बना दिया गया। हकीकत यह है कि कुछ लोग जब भी किसी को कुछ देते हैं या तो भारी मन से देते हैं या ऐसी चीजें देते हैं जो उनके लिए उपयोगी नहीं होती है। संत विनोबा भावे को जमींदारों ने दान में बंजर भूमि दी थी। बाद में उसे गरीबों के बीच बांटा गया। मेरे क्षेत्र के तथाकथित दानवीरों ने तो कुछ समय के बाद यह जमीन भी गरीबों से छीन ली।
उन दिनों मैं, ठाकुरजी (जो मेरे शिक्षक और सहकारी सहयोग समिति के वेतन भोगी प्रबंधक थे) की साइकिल लेकर कॉलेज चला जाता था। वेतन भोगी शब्द की अपनी दुखद कहानी है। वेतन के नाम पर दो सौ रुपये का स्टाराइपेंड दिया जाता था, वह भी साल-दो साल में। यह क्या अपमानजनक नहीं है कि किसी को कहा जाए कि ये सरकारी मुलाजिम हैं और वेतन लेते हैं। कुछ बातें कहने योग्य नहीं होतीं। कोई सोच सकता है कि साइकिल के बहाने मैं इतनी प्रासंगिक कथाएं क्यों बाँच रहा हूँ। तो इसका जवाब यही है कि सागर में जब लहरें आती हैं तो बहुत सी चीजें जिनका कोई उपयोग नहीं होता, तट पर छोड़ जाती हैं। दुःख मन के सागर में उठने वाली लहरें नहीं तो क्या हैं? बहरहाल, नयी-नयी शादी हुई थी। कॉलेज जाने का मन नहीं करता था। कभी-कभी तो बीच रास्ते से लौट भी जाया करता था। यह सब रोचक प्रसंग तो अन्यत्र चर्चा का विषय है। फिलहाल, साइकिल पर लौटता हूँ।
मेरी अपनी साइकिल की कहानी तो और लज्जाजनक और दुखद है। उसे कहने का साहस कभी जुटा पाया तो अवश्य कहूँगा। साइकिल धीरे बहुत पुरानी हो गयी। उसकी स्थिति घर में बुजुर्गों सी हो गयी। टूटने के कारण उसके अंग-प्रत्यंग का प्रत्यारोपण हो चुका था। देखने में वह बाबूजी की साइकिल जैसी लगती ही नहीं थी। बाबूजी का साइकिल से नेह-छोह वाला मानवीय सम्बन्ध था। मुझे याद है जब कभी साइकिल में कीचड़ लग जाता था। बाबूजी पूरी साइकिल को धोते थे। कपड़े से पोंछकर उसे सुखाते थे। फिर सम्पूर्ण साइकिल में नारियल तेल लगाते थे। उनका मानना था कि जो मेरी सेवा करे, मुझे भी उसकी सेवा करनी चाहिए। यन्त्र से भी यांत्रिक सम्बन्ध नहीं होना चाहिए। अंततः बाबूजी सामाजिक व्यवस्था (सिस्टम) के शिकार हुए और मस्तिष्क-आघात के कारण तीन दिनों के मौन के पश्चात अपनी प्यारी साइकिल को छोड़कर पवन रथ पर सवार होकर चले गए। साइकिल भी कब तक चलती? उसकी भी काया जीर्ण-शीर्ण हो चली थी। हम लोग उससे तालमेल न बिठा पाए। प्यारी साइकिल न जाने किस दिन अज्ञात पथ पर विदा हो गयी। मुझे भी नहीं पता। मेरी स्मृतियों में पिताजी मुस्कुराते हुए साइकिल से घर लौट रहे हैं।
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ललन चतुर्वेदी एक कवि-लेखक हैं। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : ललन चतुर्वेदी की कविताएँ
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बहुबहुतत रोचक तरीके से साइकिल के जरिए लिखा गया यह लेख हमारे मन के कोमल तन्तुओं को छूता है। एक परिदृश्य उठता है और बनता चला जाता है। ललन सर को बधाई और गोल चक्कर का शुक्रिया
संस्मरण बहुत रोचक और अच्छा लगा, एकबार में ही पढ़ गया। मेरे पिता शिक्षक थे , मेरे जन्म के कुछ दिन बाद तक घोड़ा से और अनायास उसकी मृत्यु के बाद साइकिल से स्कूल जाया करते थे। मैंने बीस बाइस की उम्र तक साइकिल चलाई। खेत पर, आसपास के गांव और नजदीकी शहर पछार तक साइकिल से ही आता-जाता रहा। पिता जी के पास अलग एक साइकिल थी और मेरे पास अलग।
साइकिल से जुड़ी बहुत सी स्मृतियां हैं, जो आज आपका संस्मरण पढ़ते हुए एक-एक कर याद आ गईं। लिखते रहिए, शुभकामनाएं।
भानु प्रकाश रघुवंशी