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मिथ्या आख्यान बनाम सत्य के प्रतिरोध
स्वाभाविक सवाल उठ सकता है कि सत्य इतना हाशिए पर कैसे चला गया? लोग इस हद तक उदासीन कैसे हो गए कि उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं रही कि वे जो मानते हैं, उसका तथ्यात्मक आधार है या नहीं?
20 hours ago


नसीब का पत्थर
शिकार से कहीं ज़्यादा मेरी दिलचस्पी उस इंतज़ार में थी, जो शिकार से ऐन पहले आता है—मछुआरों को जाल बिछाते देखना, उनका घात लगाए बैठे रहना और साँस तक संभाल-संभालकर लेना, ताकि हवा की कोई लहर उनके जिस्म की गंध परिंदों तक न पहुँचा दे।
4 days ago


आज की ईरानी कविताएँ
जब वह सरहदों पर होती है।
कँटीला तार उसकी स्कर्ट चीर देता है।
फूल चीख़ उठते हैं
और पंखुड़ियाँ कँटीली बाड़ पर
टंगी रह जाती हैं
5 days ago


दुःखी जीवन (कला समीक्षा)
यह उदाहरण केवल उस समय का ही नहीं, बल्कि हर उस दंगे का है, जो उस समय के बाद से लगातार होते ही रहे हैं। देश के अनेक शहरों को हिंसा का स्वाद दिया गया और आगे भी दिया जाता रहेगा। बिना किसी डर और संकोच के। आग ने घरों के अलावा मानवीय संबंधों, उनके सपनों को भी राख कर दिया।
6 days ago
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