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हिमांशु जमदग्नि की कविताएँ
यहाँ हर रात काल गश्त लगाता है
खा जाता है उन सृपों के सर
जो कोतवाल के ख़िलाफ़ जाने वाले थे


काश ऐसे ही फूल हमारी ज़िंदगियों में भी खिल पाएं
बड़ा फूल कह रहा है, बच्चा फूल सुन रहा है : “कल मैं मुरझाकर मर जाऊंगा तब तुम महकाना इस बगिया को!”


सुधीर डोंगरे की कविताएँ
आज अचानक उसे स्मृत हो आयी स्नानागार की वह दीवार जहाँ वह रखकर भूल आयी थी अपने कुंवारेपन का झीना लिबास।
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