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मौमिता आलम की कविताएँ
उन्होंने किराने का सामान जमा नहीं किया है
उनके पास कल नहीं है
उनके पास आज ही है
वे इक्कीस दिन तक नहीं जीते


रुत बरसन की आई (बारिशें और रेगिस्तान)
जब बरसने लगता है गरज-गरज कर तो बुढ़िया माई के चेहरे पर उतर आती है दंतविहीन मुस्कान। वह चारपाई पर बैठे-बैठे उसी मुस्कान संग देखती रहती है बच्चों के पानी के साथ छपाक-छप के करतब।


खेमकरण ‘सोमन’ की कविताएँ
हमेशा होश में लिख
कदम बढ़ाकर जोश में लिख
आँखों में आँखें डालकर लिख
ख़ुद को थोड़ा उबालकर लिख
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