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शिवांगी पांडेय की कविताएँ
मकान यूँ ही गिरता रहा
मेरे अंग यूँ ही छिलते रहे
और मैं रक्त से पोस्त के बीज चुनकर
कराहती हुई
उन्हें अपने बग़ीचे में बोती रही


ज्योति रीता की कविताएँ
जीवन जो उन्हें देखते हुए जिया जा रहा था—
अब बस अंधेरा है…
कहाँ से आएगी कोई रोशनी
क्या कोई खिड़की खुलने की उम्मीद अब भी बची है


योगेंद्र गौतम की कविताएँ
मुझे मौसमों के बदलने से याद आती
लंबी कहानियां
जिनमें मिट जाता अंतर
बुढ़िया के चेहरे और वर्षावनों का
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