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कच्चे दूध की गंध (चीनी कहानी)
जब उनका चेहरा खुशी से दमकता तो उनके मुँह के दोनों छोरों पर डिंपल उभर आते—नई-नवेली माँ बनने का आह्लाद और गर्व उनके चेहरे से फूटा पड़ता था। उनके आसपास से जो भी गुजरता, उसे माँ के ताजे दूध की भीनी-भीनी गंध अपने आगोश में ले लेती।


पाताल की दुखती रगें
पाताल की दुखती रगें कहानी : तौसीफ़ बरेलवी उसे कई रोज़ से अपने हम नफ़्सों के ख़ून की बू आ रही थी लेकिन वह उस बू के पीछे जा भी नहीं सकता था। हाँ उसके अंदर से एक हौल ज़रूर उठ रही थी कि कुछ बहुत भयानक होने वाला है। पूरा जंगल रोज़ जिन परिंदों कि चहचहाहटों से अपनी सुबह करता था, अब वे आवाज़ें ख़ामोश होने वाली थीं। आख़िर ऐसा भी क्या हो गया था...? वह उस पसरती हुई ख़ामोशी का पता लगाना चाहता था लेकिन उससे कुछ करते नहीं बन रहा था। आख़िर वह कर भी क्या सकता था? अपनों के ख़ून की बू के साथ ही दिल को थर्


प्रेमचंद से संवाद (यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते)
प्रेमचंद से संवाद (यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते) हिमांशु विश्वकर्मा यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते, तो वे भारत से क्या कहते और हम उनसे क्या पूछते? यदि सचमुच मुझे आज प्रेमचंद से मिलने का अवसर मिलता, तो शायद सबसे पहले मैं उनसे यही पूछता- “प्रेमचंद जी, आज का भारत देखकर आपको कैसा लगता है?” वे संभवतः मुस्कुराकर कहते- “भारत बदला है, और बहुत बदला है। विज्ञान आगे बढ़ा है, लोकतंत्र मजबूत हुआ है, शिक्षा का विस्तार हुआ है, तकनीक ने जीवन को नई गति दी है। इन उपलब्धियों पर प्रसन्न होना च
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