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पैमाना सिर्फ़ एक है कि लिखाई अच्छी होनी चाहिए
मैं नहीं मानती कि स्त्रीवाद कभी भी ‛पूँजीवाद’ जैसी किसी भी दूसरों के दमन और शोषण पर आधारित व्यवस्था का समर्थक हो सकता है।


संदीप निर्भय की कविताएँ
जीवन की गाड़ी को धकियाकर ले आया तीस के पार
क्या बाक़ी का बचा जीवन यों ही गुज़र जाएगा
इन ठग-ठगोरी भारतीय रेलों में
जहाँ-तहाँ ज़िम्मेदारियों का थैला कंधों पर लिए


एक टिकट मेरे लिए भी
लघुशंका के बाद पिक्चर-हॉल में प्रवेश करना उचित होगा। यही सोच उसने सड़क किनारे बने मू़त्रालय का रुख किया। ‘बचपन की गलतियों से निराश न हों। नामर्दी, शीघ्रपतन, धातुरोग में जड़ी-बूटियों से गारण्टीशुदा इलाज के लिए ‘वैद्य जी कंचनगढ़ वाले’ से शीघ्र मिलें या लिखें, जवाबी लिफाफे के साथ।’
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